श्री प्रभु कहते हैं कि किसी के दुःख से दुःखी होना अच्छी बात
श्री प्रभु कहते हैं कि किसी के दुःख से दुःखी होना अच्छी बात है, पर किसी के सुख मे सुखी होना और भी अच्छी बात है, क्योंकि लोग तो अक्सर दूसरों का सुख देख कर और भी अधिक दुःखी हो जाते हैं…
हमारे शरीर की सभी इन्द्रियां जो बाहर से ग्रहण करती हैं, वही वापस भी कर देती हैं…
जैसे हम शुद्ध वायु साँसों द्वारा शरीर में ग्रहण करते हैं और अशुद्ध वायु वापस करते हैं…,
हमारी आंखें जो देखती हैं उसे व्यक्त कर देती हैं-
दुःख को आँसुओं के द्वारा और खुशी को अपनी चमक से…
जैसे त्वचा गर्मी को सोख कर पसीने के रूप में…
किन्तु हमारी श्रवणेन्द्रि ही एक मात्र ऐसी इंद्रिय है जो ग्रहण करती है वो गहराई तक समा जाता है, उसे वापस नहीं करती है, किन्तु उसकी अभिव्यक्ति दूसरी इन्द्रियों द्वारा होती है…
यदि कुछ अच्छा सुनते हैं तो रोम रोम पुलकित हो जाता है, आंखें खुशी से छलकने लगती हैं, कुछ बुरा सुनने पर आँखों में आंसू आ जाते हैं, सांसे तेज हो जाती हैं…
हमें अज्ञान वश जो चीज़ विसर्जित करनी होती है उसे विसर्जित नहीं करते हैं, जो घर में रखनी है उसे घर में नहीं रखते हैं, और जो वस्तु वापस कर देनी है, उसे वापस नहीं करते हैं…
वास्तव में ज्ञानी वो हैं, जो यह जानते हैं कि शरीर विसर्जित करने की चीज़ है, संसार की सारी वस्तुएँ लौटा देनी की हैं,
वास्तव में इस संसार में कुछ भी अपना नहीं है-
सब कुछ दूसरों के लिए लौटाना है, हमारा शरीर भी हमारा नहीं है वह भी नष्ट हो जाएगा, बस एकमात्र चीज़ जिसे हम अपने हृदय में अपने साथ रख सकते हैं वह है ईश्वर- अर्थात आत्मा…
और हमारी आत्मा भी हमारे परमात्मा के पास हमारे न रहने पर वापस चली जाती है…
अतः सिवाय ईश्वर के, इस संसार में हमारा कुछ भी नहीं, कोई भी नहीं है…
सुनील पुष्करणा