/•• प्रीत के मोती ••/
/•• प्रीत के मोती ••/
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नर्म बिछौने तज कर चाहे,
कांटों पर नित हो सोना
विपरीत फिजाएं हो जाएं
शत्रुमय वसुधा का कोना
चर्म चक्षु के प्याले चाहे
अश्कों से भर भर जाए
— तुम प्रीत के मोती ही बोना-
तुम हरगिज़ धीर नहीं खोना
पत्थर को देव बनाने तक
सागर से सीप चुराने तक
कलियों के खिलखिलाने तक
अम्बर को छूकर आने तक
खिन्न हृदय हो जाए चाहे
कोई शत्रु अहित कर जाएं
— तुम प्रीत के मोती ही बोना
तुम हरगिज़ धीर नहीं खोना
अंधियारों के छंट जाने तक
विपरीत समय कट जाने तक
सपनों को पंख लगाने तक
मंजिल को अपने पाने तक
राह कठिन हो जाए चाहे”चुन्नू”
घात कोई अपना कर जाए
— तुम प्रीत के मोती ही बोना
तुम हरगिज़ धीर नहीं खोना
/••• क़लमकार •••/
चुन्नू लाल गुप्ता-मऊ (उ.प्र.) ✍️