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26 May 2025 · 1 min read

अपनी अपनी तकदीर आजमाना चाहते हैं

अपनी अपनी तकदीर आजमाना चाहते हैं
बेटे बड़े हो गए घर छोड़कर जाना चाहते हैं।

बुढ़ापे की दुश्वारियों में खामोश हैं माँ-बाप
बुलंदियों पर बेटों को पहुंचाना चाहते हैं।

भूख कम हो गई है और आंख नम है
बच्चों के साथ रोज खाना खाना चाहते हैं।

आजकल ऐसी खबरों से अख़बार भरा है
बुजुर्गों को लोग नही अपनाना चाहते हैं।

गुमान है जिनको शहरों की चहारदीवारी पर
उनको अपना गांव हम दिखाना चाहते हैं।

लोग परिवार से टूटकर बंटते जा रहे हैं
न जाने कौन सा शुकून पाना चाहते हैं।

जीवन के संघर्ष में आनंद कैसे पाना है
दादी दादा कहानियां सुनाना चाहते हैं।

‘विनीत’ हमने देखी है बेबसी उन परिंदों की
आ नही सकते जो लौट कर आना चाहते हैं।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

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