कुंडलिया. . . .
कुंडलिया. . . .
अपने छूटे द्वेष में, कल्पित है व्यवहार ।
तनहा जीवन ढूँढता, अपनों का संसार ।।
अपनों का संसार , कहाँ हैं अपने सारे ।
झूठा है अपनत्व ,सभी इस गम के मारे ।।
दिन वो बीते आज , लगें सब रीते सपने ।
देते थे जो जान, कहाँ सब हैं वो अपने ।।
सुशील सरना / 26-5-25