पर्यावरण बचाओ
चंद रोज से खांसी आ रही है
खांस खांस कर जान जा रही है
हवा में धुआं सा भर गया है
सांस लेना दूभर हो गया है।
मौसम क्यों इतना
बेरहम है खफ़ा है
बता दे हमें
क्या हमारी खता है।
मौसम बोला
ये जो पर्यावरण में
तुमने आग लगाई है
तुमसे पहले
मेरी जान पर बन आई है
धुएँ और धूल से मेरे फेफड़े जाम हैं
सागर नदियां धरा अंतरिक्ष
चहुं ओर मचा कोहराम है।
मेरा जीवन चक्र
शिथिल पड़ गया है
और इस बदलाव पर
अब अड़ गया है
बहुत किया नियंत्रित
पर तुम न हुए संयमित।
काश ! तुमने सुनी होती
मेरे खांसने की आवाज
बिगड़ती हवाओं की
तबियत नासाज
अब जहरीली हवाओं की
आदत डाल लो
या कमर कस लो
परिवर्तन की ठान लो
हवा पानी मिट्टी को
प्रदूषण से बचाओ
बृक्षों का कटान रोको
पेड़ खूब लगाओ।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’