विचारधारा बनाम जातिवाद
सिर्फ कहने सुनने के लिए जातिवाद बदनाम है जबकि जाति वाद की स्थिति एक टूटे पेड़ की तरह हो चुकी है जिसे काटकर विचारधारायें अपने घर ले जा रही हैं, आज के समय में ना कोई पूर्णतः ब्राह्मण रह गया ना कोई छत्रिय रह गया ना कोई वैश्य रह गया ना कोई शूद्र रह गया और ना कोई हिंदू मुसलमान रह गया है सिर्फ कहने के लिए तमाम नस्ले हैं मान्यतायें और रीति रीवाज हैं मगर सवारी इन पर कुछ विचारधाराए कर रही है। सभी विचारधारायें सामयिक और परिस्थिति जन्य होती हैं जो हमारा मार्गदर्शन करने के साथ-साथ हमारे लिए उत्प्रेरण का कार्य करती हैं जो ज्यादा सुगम और अर्थ पूर्ण होता है परिवार समाज देश और दुनिया हर जगह लड़ाई और सामंजस्य विचारधाराओं में ही होता है विचार धाराओं की लड़ाई मे कोई किसी का सगा और सौतेली नहीं होता, लोग सोच रहे हैं कि देश और समाज में जातिगत राजनीति का बोलबाला है जातिवाद तो अनायास बदनाम है इन पर राज तो विचारधारायें ही कर रही हैं जो साफ तौर पर देखा जा सकता है कि सभी राजनीतिक पार्टियों में सभी जाति और धर्म के लोग जुड़कर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं उनकी अपनी प्राथमिकताएं भी उनकी विचारधाराओं से जुड़ी हुई हैं इसलिए कभी भी किसी भी चुनाव में अपने स्वार्थ का चोला उतार कर देश हित और समाज हित में उत्तम और स्वस्थ विचार धारा के साथ जुड़ें