तेज प्रताप का निष्कासन, नैतिकता या नौटंकी?: अभिलेश श्रीभारती
साथियों,
इस शीर्षक के विषय पर अपनी बातों को रखने से पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं “राष्ट्रहित सर्वोपरि” के सिवा किसी भी राजनीति विचारधारा का समर्थन नहीं हूं। मैंने आज तक कई सारे राजनीतिक, सामाजिक और वैश्विक मुद्दे पर अपने प्रतिक्रिया और अपनी बातों को रखा लेकिन आज मैं जिस राजनीतिक विषय पर लिखने जा रहा हूं यह कोई मुद्दा नहीं बल्कि एक संवेदनशील घटना है जिसे आपको समझना चाहिए।
अब देखिए ना जैसे ही हमारे तेजू भैया ने अपने रिश्ते के बारे में देश दुनिया को बताया वैसे ही बिहार की राजनीतिक में जैसे भूचाल आ गई हो। हमारे लालू चच्चा ने तत्काल लोक लाज की दुहाई देते हुए तेजू भैया को 7 साल के लिए पार्टी और परिवार से बाहर का रास्ता दिखा दिए।
अब मेरा सवाल कि चुनाव से कुछ महीने पहले अचानक लालू प्रसाद यादव का नैतिक मूल्यों की दुहाई देना और तेज प्रताप यादव को पार्टी एवं परिवार से निष्कासित करना एक गंभीर राजनीतिक घटनाक्रम है — लेकिन इसे केवल एक ‘अनुशासनात्मक कार्रवाई’ कहना शायद सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा। यह घटनाक्रम एक रणनीतिक ड्रामेबाज़ी, एक सुनियोजित नौटंकी और पब्लिक सेंटीमेंट को साधने की कोशिश अधिक प्रतीत होती है।
लालू यादव भारतीय राजनीति के उस यथार्थवादी चेहरे का नाम हैं, जिनकी राजनीति हमेशा आमजन के अधिकारों की बात करते हुए भी निजी हितों के समीकरण से बंधी रही है। और यह कोई पहली बार नहीं है जब लालू जी ने नैतिकता का मुखौटा पहनकर अपने राजनीतिक घर को संभालने की कोशिश की हो। आज वे जिस नैतिकता, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं की बात कर रहे हैं, वही लालू कल तक अपने पुत्र की हर गलती पर मौन बने रहे। कभी-कभी तो ‘धृतराष्ट्र’ की भूमिका में भी नजर आए।
ऐश्वर्या राय प्रकरण किसे याद नहीं है? तेज प्रताप यादव और ऐश्वर्या की शादी और फिर उसके बाद जो कुछ भी हुआ — उसमें पिता लालू यादव की भूमिका बेहद रहस्यमयी और मौन रही। जब ऐश्वर्या राय ने रोते हुए अपने साथ हुए अन्याय की बात कही, तब लालू यादव ने कोई सार्वजनिक बयान देना उचित नहीं समझा। लेकिन आज, जब तेज प्रताप खुद अपने संबंधों को सार्वजनिक कर देते हैं — लालू जी नैतिकता का शंखनाद करने लगते हैं। यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है?
तेज प्रताप यादव का यह दावा कि वे 12 वर्षों से एक महिला (अनुष्का यादव) के साथ रिश्ते में हैं, न केवल पारिवारिक संस्थाओं पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी बताता है कि साल 2018 में हुई उनकी शादी क्या एक जबरदस्ती थी? क्या यह सिर्फ राजनीतिक और सामाजिक संतुलन साधने के लिए लिया गया फैसला था?
यह सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि तेज प्रताप की इस स्वीकारोक्ति के बाद न केवल अनुष्का की सुरक्षा और मानसिक स्थिति पर प्रश्न उठते हैं, बल्कि इस पूरे मामले में राजनीति, रिश्ते और संवेदनाओं के बीच पिसते व्यक्तियों की पीड़ा भी उजागर होती है।
और अगर हम अभिषेक की रहस्यमयी मौत की पृष्ठभूमि को याद करें — तो एक और सन्नाटा हमारे सामने खड़ा हो जाता है। एक ऐसा सन्नाटा, जो इस बात की तस्दीक करता है कि चुप्पी अक्सर विनाश की भूमिका लिखती है।
तेज प्रताप यादव की शैली शुरू से ही ‘लीक से हटकर’ रही है — और यही शैली अब पार्टी के लिए समस्या बन गई। लेकिन यदि यह सब राजनीति के लिए इतना असहनीय था तो यह ‘सच’ पहले क्यों नहीं उजागर हुआ? क्यों नहीं तेज प्रताप को पहले चेतावनी या मार्गदर्शन दिया गया?
यह स्पष्ट है कि तेज प्रताप यादव का निष्कासन एक ‘राजधर्म’ नहीं, बल्कि एक डैमेज कंट्रोल की रणनीति है। लालू यादव अब स्पष्ट रूप से यह समझ चुके हैं कि पुत्र मोह और सार्वजनिक विश्वास के बीच उन्हें किसे चुनना है। और शायद यह वही राजनीति है, जिसमें परिवार और भावनाएं, वोट बैंक की मजबूरी के आगे बौनी हो जाती हैं।
आज राजनीति में रिश्तों की पवित्रता और व्यक्तिगत नैतिकता की बातें केवल वक्तव्यों तक सीमित रह गई हैं। एक समय था जब नेता अपने आचरण से समाज के लिए आदर्श बनते थे, लेकिन अब राजनीति एक ऐसा व्यवसाय बन चुकी है, जहां विरासत, छवि प्रबंधन और पब्लिक ड्रामा ही आगे बढ़ने का जरिया बन गए हैं।
यहां रितेश देशमुख का उदाहरण अत्यंत प्रासंगिक है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे ने विरासत की राजनीति को स्वीकार नहीं किया, बल्कि अपनी रुचि और क्षमता के अनुरूप अभिनय की दुनिया में खुद को स्थापित किया। तेज प्रताप यादव के पास भी यह अवसर है — वे सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हैं, कैमरा फ्रेंडली हैं और शायद अभिनय में राजनीति से अधिक सफल हो सकते हैं।
अब जब उन्हें पार्टी और परिवार से बाहर कर दिया गया है, यह उनके लिए खुद को पुनः परिभाषित करने का समय है — बिना किसी राजनीतिक दबाव के, अपनी पसंद से, अपने स्वाभिमान के साथ।
इस पूरे प्रकरण में सबसे गहरी बात यह है कि अब राजनीति में कुछ भी पूरी तरह निजी नहीं रहा। एक नेता का निजी जीवन, जब वह समाज के लिए जिम्मेदार होता है, तब वह स्वतः ही सार्वजनिक मूल्यांकन के दायरे में आ जाता है। ऐसे में तेज प्रताप की कथित ‘बगावत’ सिर्फ निजी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का विषय बन जाती है।
यह कहानी केवल तेज प्रताप की नहीं है। यह कहानी है एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की, जहां विरासत का बोझ, महत्वाकांक्षा की ऊँचाई और संवादहीनता की खाई मिलकर त्रासदियों को जन्म देती है।
ईश्वर न करे कि यह कहानी किसी नई त्रासदी में बदल जाए।
समाज, राजनीति और परिवार — तीनों को मिलकर यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या हम वास्तव में अपने मूल्यों को जी रहे हैं, या फिर केवल उनका प्रदर्शन कर रहे हैं?
राजनीति अगर रिश्तों को संभालने की जगह तोड़ने का कारण बन जाए, तो वह केवल सत्ता की दौड़ बनकर रह जाती है। ऐसे में जरूरी है कि हम न केवल तेज प्रताप जैसे लोगों से सवाल करें, बल्कि उस पूरी राजनीतिक मानसिकता से भी जो नैतिकता का चोला पहनकर जनभावनाओं के साथ खेलती है।
नोट: क्या लेखक की अपने निजी विचार है लेखक किसी भी राजनीतिक विचारधारा को समर्थन नहीं करते।
अब आपकी बारी है — क्या आप भी मानते हैं कि राजनीति में पारिवारिक मूल्य केवल दिखावे की चीज़ रह गए हैं? कमेंट कर अपनी राय ज़रूर दें।
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✍️ आलेख ✍️
अभिलेश श्रीभारती
सामाजिक शोधकर्ता, विश्लेषक, लेखक