Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
25 May 2025 · 2 min read

*लेख :"स्वयं की रचना का पाठक बनना : एक अनुभूति"*

“स्वयं की रचना का पाठक बनना : एक अनुभूति”

स्वयं की लिखी रचनाएं पढ़ना न सिर्फ आत्मसंतोष देता है, बल्कि यह आत्ममंथन और आत्मविकास का माध्यम भी बनता है। जब हम अपनी ही लिखी बातों को दोबारा पढ़ते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि हम किस मानसिक अवस्था में थे, क्या सोचते थे, और कैसे धीरे-धीरे बदल रहे हैं।

लेखक होना एक रचना प्रक्रिया है, लेकिन अपनी ही रचना का पाठक बनना एक अनोखी और भीतर तक छू जाने वाली अनुभूति है। यह वह क्षण होता है जब हम सृजनकर्ता की भूमिका से हटकर एक दर्शक, एक समीक्षक और कभी-कभी एक अनजाने पाठक की भूमिका में प्रवेश करते हैं।

जब हम अपनी लिखी पंक्तियों को पुनः पढ़ते हैं, तो शब्दों के पीछे छिपे भावों की गहराई को नए दृष्टिकोण से अनुभव करते हैं। कभी लगता है, “क्या ये सच में मैंने लिखा था?” और यह प्रश्न गर्व, आश्चर्य और आत्म-साक्षात्कार की त्रिवेणी बन जाता है।

स्वयं की रचना का पाठक बनना हमें हमारे भीतर की यात्रा का आईना दिखाता है। हम अपनी सोच, संवेदनाओं, आशाओं और आशंकाओं को फिर से जीते हैं। किसी कविता की पंक्तियाँ फिर से दिल में उतरती हैं, किसी कहानी के पात्र फिर से साँस लेने लगते हैं, और किसी विचार की चिनगारी फिर से जल उठती है।

यह अनुभव कभी प्रेरणा बन जाता है , “मुझे और लिखना चाहिए,”
कभी सुधार की गुंजाइश दिखाता है , “यहाँ और गहराई आ सकती थी,”
और कभी आत्म-स्वीकृति देता है , “मैंने कुछ सच्चा रचा है।”

इस प्रक्रिया में एक अनकहा संवाद चलता है , लेखक और पाठक के बीच, जो दरअसल एक ही व्यक्ति है। यह संवाद हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है, हमें परिपक्व बनाता है, और यह सिखाता है कि रचना केवल शब्दों का मेल नहीं, आत्मा की अनुगूंज होती है।

अंततः, स्वयं की रचना का पाठक बनना, स्वयं से मिलने जैसा है, नये नज़रिए से, बिना पूर्वग्रहों के। और शायद, यही आत्म-अनुभूति लेखन की सबसे मूल्यवान प्राप्ति है।
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”

Loading...