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25 May 2025 · 1 min read

कुंडलिया. . . .

कुंडलिया. . . .

पारा दिन- दिन बढ़ रहा, बढ़ता जाए ताप ।
ऐसा लगता ताप का, दिया किसी ने शाप ।
दिया किसी ने शाप , समझ में तनिक न आता ।
कैसे रोकें ताप , दिनों -दिन बढ़ता जाता ।
करके सकल प्रयास , जीव यह आखिर हारा ।
अर्क न बदले चाल, ताप का बढ़ता पारा ।

सुशील सरना / 24-5-25

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