कुंडलिया. . . .
कुंडलिया. . . .
पारा दिन- दिन बढ़ रहा, बढ़ता जाए ताप ।
ऐसा लगता ताप का, दिया किसी ने शाप ।
दिया किसी ने शाप , समझ में तनिक न आता ।
कैसे रोकें ताप , दिनों -दिन बढ़ता जाता ।
करके सकल प्रयास , जीव यह आखिर हारा ।
अर्क न बदले चाल, ताप का बढ़ता पारा ।
सुशील सरना / 24-5-25