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25 May 2025 · 8 min read

#28वें_स्थापना_दिवस_पर_विशेष

#28वें_स्थापना_दिवस_पर_विशेष
■आधी सदी पुराने रक्तरंजित संघर्ष की देन है सरहदी जिला : श्योपुर
◆ चार निरीह नागरिकों के बलिदान ने दी थी मांग को आंच
◆ जनता ने महज 27 साल में भुला दी लम्बी लड़ाई
◆ कांग्रेस ने दी सौगात, भाजपा ने बदले हालात
【प्रणय प्रभात】
आज 25 मई को देश के हृदय मध्यप्रदेश का सरहदी श्योपुर जिला पूरे 27 साल का यानि कि पूरी तरह से जवान हो गया है। इस बार ख़ास बात यह है कि जिले की 27वीं सालगिरह को बीते ढाई दशकों जैसे आम दिनों की तरह नहीं बिसराया व बिताया गया है। बल्कि स्थापना दिवस का जश्न “गौरव दिवस” के रूप में दो वर्ष पूर्व चुनाव काल में “रजते-जयंती वर्ष” के रूप में मनाने की रस्म-अदायगी के बाद इस बार फिर समय संयोगवश की गई है। प्रसंग में है श्री हजारेश्वर महादेव मेले के रंगमंच पर आज रात आयोजित होने जा रही “कॉलीवुड नाइट।” जिसे रोशन करने के लिए मायानगरी मुंबई के ख्यातनाम कलाकारों के दल को आमंत्रित किया गया है।
क्षेत्र, ज़िले व अंचल से लेकर सूबे तक की राजनीति और उसके अनुगामी प्रशासन ने पूरे ज़ोर-शोर से यह दिन 2023 में मनाया। जिसे 2024 में एक बार फिर लपेट कर आले में रख दिया।शायद जन अदालत से मिले प्रतिकूल आदेश से खिन्न हो कर। लगा कि दो वर्ष पहले के आयोजन के पीछे की मूल वजह विधानसभा का चुनाव ही था। वरना दो साल पूर्व कथित “गौरव दिवस” का आगाज़ नामुमकिन सा ही था। मुमकिन होता तो इस दिवस को गौरव दिवस मानने व मनाने में 25 साल नहीं लगते।
याद दिलाना मुनासिब होगा कि जनसंघर्ष के सुफल से जुड़े आज के इस खास दिन ना तो कोई आयोजन बीते 27 सालों में एक बार के अलावा सलीके से हुआ, ना ही लोगों ने जिला निर्माण के जटिल संघर्ष और चार निरीह नागरिकों के बलिदान को शिद्दत से याद किया। चार अमोल जिंदगियों के बलिदान और तमाम लोगों के संत्रासपूर्ण संघर्ष का आधी सदी पुराना वाक़या एक भूली-बिसरी सी दास्तान ही बना रहा। मौजूदा भाजपा सरकार ने 2023 में चुनावी आहट को महसूस कर सभी जिलों के *गौरव दिवस” आयोजित कराने का निर्णय लिया। जिन पर 2024 में अमल चुनावी नतीजों पर केंद्रित रहा। इसी क्रम में आज 25 मई को श्योपुर ज़िला एक बार फिर से धन्य हों था है, यह सुखद है। हालांकि इस सालाना आयोजन का भविष्य आज भी तय नहीं है, तथापि आस की जा सकती है कि यह दिवस 2028 में होने वाले चुनाव से पूर्व 2026 ब 2027 में भी आज की तरह बिना किसी सियासी मक़सद के मनाया जाएगा। ज़िला स्तर पर नहीं तो मेला स्तर पर ही सही। संतोष की बात यह है कि इस बहाने नौजवान पीढ़ी को ज़िला निर्माण के गुमनाम अतीत से परिचित होने का थोड़ा-बहुत मौक़ा ज़रूर मिलेगा।
अब आपको बताते हैं कि अर्द्ध शताब्दी पहले के संघर्ष की गाथा आख़िर थी क्या? ज्ञात रहे कि श्योपुर को जिला बनाए जाने की प्रबल मांग वर्ष 1974 में हुई थी। जिसके सूत्रधार तत्कालीन विधायक व प्रखर जनसंघी नेता रामस्वरूप वर्मा (सक्सेना) रहे। प्रयोजन के साथ तत्समय गठित संघर्ष समिति के अध्यक्ष वरिष्ठ अभिभाषक रोशनलाल गुप्ता तथा महामंत्री रामस्वरूप वर्मा रहे। जो अब दुनिया में नहीं हैं। उपाध्यक्ष रहे वरिष्ठ अधिवक्ता देवीशंकर सिंहल भी अब दिवंगत हो चुके हैं। इस पीढ़ी से वास्ता रखने वाले पूर्व विधायक सत्यभानु चौहान जिले के लिए हुए जनसंघर्ष के गवाह आज भी हैं। मांग को प्रबल बनाने की कोशिशें तत्समय उपलब्ध संसाधनों के बलबूते जारी रही। जिला निर्माण हेतु गठित आंदोलन समिति को लगा कि सरकार सुनवाई के मूड में नहीं है। लिहाजा वर्ष 1975 में इसे जनांदोलन का रूप देते हुए अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन सूबात कचहरी के सामने शुरू कर दिया गया।
इसी दौरान 21 मई 1975 को आया वो काला दिन, जो बाद में इस मांग को आंच देने वाला भी रहा। तत्कालीन सरकार से चर्चा के लिए भोपाल गया आंदोलनकारियों का शिष्टमंडल मांग नामंजूर होने की मायूसी के साथ श्योपुर लौटा। धरना स्थल पर जमा बड़ौदा व श्योपुर के वाशिंदों में रोष व असंतोष व्याप्त हो गया। धरना खत्म करने का निर्णय लिए जाने के साथ डेरे-तंबू समेट लिए गए। आंदोलनकारियों की वापसी के दौरान चौपड़ बाजार स्थित स्टेट बैंक पर तैनात गार्ड को उपद्रव की आशंका हुई। इसी दौरान दो-चार पत्थर बैंक की ओर फेंके गए और जवाब में पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में चार निरपराध नागरिकों गप्पूमल वैश्य, वजीर खां, मुंशी हसन मोहम्मद और जुम्मा भाई का बलिदान हो गया। भीड़ बेकाबू हो गई और गुस्से की आग तत्कालीन न्यायालय व तहसील सूबात कचहरी तक जा पहुंची। फिर लगा दिया गया कर्फ्यू और शुरू हो गया पुलिस का तांडव, जिसकी जद में समूचा शहर आया।
जिला निर्माण आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी करने वाले सर्वोदयी नेता मंगलदेव फक्कड़, समिति के सदस्य पं. रमाशंकर भारद्वाज, कैलाशनारायण गुप्ता, प्रेमचंद जैन, रामबाबू जाटव, शिवनारायण नागर, कैलाश सेन सहित तमाम ज्ञात अज्ञात आंदोलनकारियों को पुलिस ने घरों में घुस घुसकर बर्बरता के साथ पीटा। मामला शांत होने के बाद गोलीकांड की जांच के लिए जस्टिस एमएल मलिक की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया। आयोग ने तथ्यों व साक्ष्यों की सुनवाई करने के बाद माना कि जिला निर्माण की मांग जायज है। आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वालों ने सरकार पर दवाब बनाना एक बार फिर से शुरू कर दिया। श्योपुर आने वाले हरेक राजनेता से लेकर बड़े अधिकारियों तक को ज्ञापन देना इस लड़ाई का शांतिपूर्ण हिस्सा रहा।
तमाम बार प्रतिनिधिमंडल राजधानी पहुंच कर प्रदेश के तत्कालीन मुखियाओं से मिलते रहे। इसी मांग और दवाब का नतीजा जस्टिस बीआर दुबे की अध्यक्षता में गठित जिला पुनर्गठन बोर्ड के रूप में सामने आया। आंदोलन समिति के सदस्य और तत्कालीन युवा व अब भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश नारायण गुप्ता पहला आवेदन लेकर बोर्ड के सामने पहुंचे। इसके बाद बोर्ड के समक्ष मांगों और प्रस्तावों का अम्बार लगता रहा। श्योपुर के विकास के लिए अपेक्षित जिला निर्माण की मांग निरंतर जोर पकड़ती गई।
संभावनाऐं जिले की घोषणा को लेकर बनीं मगर एक कांग्रेसी नेता गुलाबचंद तामोट ने प्रदेश के राजकोष पर भार पडऩे का हवाला देेते हुए कोर्ट में याचिका लगा दी। जिला निर्माण का रथ बीच रास्ते में अटक कर रह गया। कालांतर में कानूनी पेचीदगियां एक-एक कर खत्म होती चली गईं। जीत जनता के सामूहिक प्रयास और विश्वास की हुई। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि श्योपुर सहित 16 नए जिलों की घोषणा 1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा द्वारा की गई थी। ये और बात है कि भाजपा सरकार की इस घोषणा के खिलाफ कांग्रेसी नेता गुलाबचंद तामोट न्यायालय की शरण में चले गए। उनका तर्क था कि इतने जिलों के एक साथ गठन के बाद राजकोष पर भारी दवाब पड़ेगा। बाद में पटवा सरकार की इसी घोषणा को अमली जामा दिग्विजय सरकार ने पहनाया।
वर्ष 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने प्रदेश में 16 नए जिलों के गठन का साहसिक फैसला किया। जिला निर्माण की घोषणा 21 मई 1998 को हुई और राजपत्र में अधिसूचना के प्रकाशन के साथ ही 25 मई को श्योपुर जिले का विधिवत लोकार्पण कर दिया गया। श्योपुर जिले के विधि-विधान से वजूद में आने का जोश जनमानस पर हावी रहा। दो-चार साल जिला निर्माण की सालगिरह भी मनाई गई। उसके बाद लोग इस सौगात के लिए हुए लंबे संघर्ष को भूल गए। लिहाजा 25 मई का एतिहासिक दिन आम दिनों की तरह गुजरता चला गया।
अब जिला उम्र के लिहाज से पूरी तरह बालिग हो चुका है। यह और बात है कि यथार्थ के धरातल पर इसकी अवस्था एक बिगड़ैल तरुण व किशोर के जैसी है। जिसकी वजह राजनैतिक मूल्यों की गिरावट, सड़क से सदन तक बेहतर नेतृत्व की कमी, प्रशासनिक विवशता और नागरिक भावना के व्यापक अभाव को माना जा सकता है। जिसमें सुधार के आसार आज भी नहीं हैं। समृद्धि के लिहाज से भौतिक विकास के साथ धनकुबेरों की तादाद में कई गुना वृद्धि के बावजूद आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का अभाव जिले की रगों में समाया हुआ है। वजह राजनैतिक, प्रशासनिक, सामाजिक सभी प्रकार की हैं।
बात विकास की करें तो सीमेंट कांक्रीट की सड़कों, भवनों, धनाढ्य कॉलोनियों और राजमार्ग जैसे भौतिक संसाधनों की दौड़ में जिला बेशक काफी आगे जा चुका है। उपज व औषधिपूर्ण वनों की बहुलता, कृषि उत्पादन की विपुलता के साथ कला-संस्कृति, साहित्य और पुरातात्विक संपदा जिले की पुरानी पहचान को कुछ हद तक बरकरार रखे हुए है। बावजूद इसके मैदानी धरातल पर जिस तीव्रगामी विकास के साथ आजीविका विस्तार की दरकार थी, उसका गति पकड़ पाना अब भी बाकी है। जिसमे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सहित परिवहन व यातायात के मुद्दे सर्वोपरि हैं। जिनके लिए जिला आज भी सीमा से तीन ओर सटे पड़ोसी प्रांत राजस्थान पर काफी हद तक निर्भर है।
पर्यटन विकास के नज़रिए से एशियाई सिंहों के नए घर के रूप में विकसित कूनो नेशनल पार्क ने ज़िले को थोड़ी सी पहचान ज़रूर दी है। यह अलग बात है कि यहां गुजरात के आधिपत्य वाले शेरों की जगह अफ्रीकी व नानीबियाई चीतों को लाया और बसाया गया है। जिनका एकाधिकार भी जीवों की बंदरबांट के कारण बने रह पाना संभव नहीं। आने वाले कल में अन्य जिलों को चीता वितरण के सरकारी मंसूबे पर अमल का आगाज जिले की नई पहचान को कितना सुरक्षित रहने देंगे, वक्त बताएगा। ऐसे में सियासी नफा नुकसान के नज़रिए से कूनो नेशनल पार्क के मुख्यालय को भी ज़िले से छीन लिया जाए तो ताज्जुब नहीं किया जाना चाहिए। वैसे भी इसका बड़ा लाभ समीपस्थ ज़िलों को ही मिलना संभावित है। जिसकी वजह घटिया स्तर की राजनीति ही बनेगी।
चिकित्सक व समुचित अमला-विहीन ज़िला चिकित्सालय तथा प्राध्यापकों व स्टाफ की भरमार के बावजूद छुटपुट गतिविधियों की भीड़ में अध्ययन सत्रों की व्यापक कमी से प्रभावित पीजी कॉलेज के भवनों को विकास मानकर मन बहलाया जा सकता है। केंद्रीय विद्यालय सहित पॉलिटेक्निक व आईटीआई कॉलेज सहित लॉ कॉलेज के बाद मेडीकल कॉलेज का भवन निर्माण व चंद चिकित्सा शिक्षकों की पदस्थी को विकास मान कर खुशी मनाई जा सकती है। शिक्षार्थ प्रवेश, सेवार्थ गमन की परिकल्पना फिलहाल बेहद क्षीण व मुश्किल है। जिले की प्रतिभाएं अपने बूते कामयाबी के कीर्तिमान पहले से ज्यादा रच रही हैं, यह निस्संदेह गर्व का विषय है।
श्योपुर-ग्वालियर के बीच छोटी रेल लाइन का वजूद खत्म हो चुका है। परिवहन सेवा पूरी तरह निजी हाथों में है। बड़ी रेल-लाइन के श्योपुर पहुंचने में और कितने बरस लगेंगे, यह ऊपर वाला ही जानता था। अब ज़रूर लगता है कि काम में गति आई है। रेल लाइन के दीगोद (कोटा) तक विस्तार की संभावना फिलहाल टेलिस्कोप से भी नज़र आने को तैयार नहीं है। रहा सवाल आर्थिक और भौतिक संसाधनों के विकास का, तो उसके पीछे लोगों की व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक कोशिशें हैं, जो एक कस्बे को नगरी का रूप सतत रूप से दे रही हैं। कुल मिला कर कुछ हुआ है जबकि बहुत कुछ होना अब भी बाक़ी है।
एक आलेख में सभी के नामों और भूमिकाओं का उल्लेख सम्भव नहीं। तथ्यों व घटनाओं के तारतम्य में मामूली त्रुटियां संभावित व स्वाभाविक हैं जिनके लिए अग्रिम क्षमा याचना एक तथ्य संकलक व लेखक के रूप में। वैसे भी लेखन में सुधार और विषय के विस्तार की गुंजाइशें हमेशा बरक़रार रहती हैं। जी यहां भी हैं और आगे भी रहेंगी।
संपादक
न्यूज़&व्यूज़
(मध्यप्रदेश)

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