"एक मुट्ठी आसमान"
मिल गया है किसी को एक मुट्ठी आसमान यहाँ।
रह गया है कोई बिलखता खाली हाथ इस जहां।।
छिन गई पैरों तले जमीन,आसमान का फिर क्या पता।
हम जैसे फकीरों को जहाँ मिली जमीं,सो गए हम वहां।।
खुशियों की बात ना कर,आसमान को देख अपनी नज़र से जरा।
चांद भी दे देता है धोख़ा, हर दिन छोटा बड़ा होकर वहां
धूमिल हो गई नज़र, मंजिल का ना मिला अता-पता।
हंस रहा है हर कोई, देखकर बेबसी पर यहाँ।।
बच्चों को ना मिला,सर छुपाने के लिए छत का एक भी सिरा।
रात चरागों संग मिलकर, गा रही बीती कहानी कल की यहां।।
चलो चलते हैं हम सभी वहाँ, ढूंढने एक मुट्ठी आसमान।
शायद ख़ुदा दे दे हम बदनसीबों को, अपने साथ रहने की रज़ा।।
तिनका-तिनका जोड़कर, बनाया था पक्षियों ने अपना आशियां।
आई तबाही ले गई ठिकाना,बेसहारों का उड़ा कर उस जहां।।
मेरे उसके बीच में अनबन रही बस इतनी सी सदा।
मुझे तारों से था इख़्लास और उसे चांद था भला।।
दरवाज़े सभी बंद फ़िर भी चीखे दौड़ती हवा संग हर दफ़ा।
कौन तोड़ता किसके लिए कफ़स में लगा ताला जंक लगा।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”