"हम कभी गिरते तो कभी संभलते हैं"
हम कभी गिरते तो कभी संभलते हैं,
हम कभी सर झुका के नहीं चलते हैं
सोच लो अंजाम मेरे साथ चलने का,
हम वो नहीं जो अपना रस्ता बदलते हैं
ये ठीक है अपने क़िस्मत के सहारे बैठे हैं,
ग़र्दिश-ए-हालात में भी सितारे निकलते हैं
मुहब्बत-ए-सुखन यूँ तकलीफ़-ए-पैग़ाम है,
मुकद्दर ही सही धूप की तपिश में पांव चलते हैं
©️🖊️ डॉ. शशांक शर्मा “रईस”
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)