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24 May 2025 · 1 min read

कुछ अनकहे एहसास

कुछ अनकहे एहसास , बिखरे हैं अंदर।
सन्नाटे को चीरते हुए, शोर के समंदर।

मुड़ के देखती हूं , बची है चंद परछाइयां
वीरानियां बची हैं ,रूठी है सब रानाईया।

जज़्बातों के सैलाब , सम्हाले न संभले
कौन किसे समझाए, सब है दिलजले।

तन्हाइयां इस कदर हावी हुई दिल पर
उस पर जमाने के अल्फाजों के नश्तर।

कोई कैसे सुलझाए दिल के ये मस्अले
बेमुरव्वत जहां में कौन साथ अब चले।

सुरिंदर कौर

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