व्यथित मन
व्यथित मन
मन होता है बैठ जाऊँ कहीं चुपचाप,
जहाँ न हो ये मशीनों की आवाज़, न नकली ताज।
हर ओर जो देखूं, नक़ाबों का मेला है,
हर एक चेहरे पर, नाकाबों का खेला है।
मन होता है लौट जाऊँ उन गलियों में,
जहाँ रिश्ते वक्त माँगते थे, जवाब नहीं।
अब तो हर बात ‘ऑनलाइन’ है, एहसास ‘ऑफलाइन’,
आँखों में नमी कम, फिल्टर ज़्यादा दिखाई दे।
मन कहता है पूछूं इस दौड़ते ज़माने से,
क्या पाया जब खो दिए बचपन के ठिकाने से?
पेड़ों की छांव में जो सुकून मिला करता था,
वो अब कहां से लाऊं, जो अब कहीं भी मिलता नहीं।
मन रोता है चीखूँ, पर शोर में खो जाती है आवाज़,
हर कोई बोल रहा है, सुनने वाला कहाँ आज?
भावनाएँ अब ‘स्टेटस अपडेट’ बन गईं हैं,
और यादें ‘क्लाउड स्टोरेज’ में दफ़न हैं।
फिर भी एक कोना दिल का कहता है—
कि बदलाव के बीच भी उम्मीद बाकी है,
अगर हम फिर से सुनना सीख लें,
तो हर रिश्ते में फिर से संगीत जागी है!
मुकेश शर्मा विदिशा