कहानी : *"दादी का बग़ीचा"*
“दादी का बग़ीचा”
छोटे से शहर की तंग गलियों में एक पुराना-सा घर था, जहाँ रहती थीं — दादी, एक 75 साल की बूढ़ी मगर खुशमिज़ाज और ज़िंदादिल औरत। उनका सबसे बड़ा खज़ाना था — उनका बग़ीचा। वहाँ गुलाब, गेंदा, तुलसी, बेला, और यहाँ तक कि सब्जियाँ भी उगती थीं।
उनके साथ रहती थी उनकी 10 साल की पोती नीरा, जो मोबाइल और टीवी की दुनिया में खोई रहती थी। उसे बग़ीचे की कोई परवाह न थी।
दादी रोज़ नीरा से कहतीं, “आओ बेटा, देखो ये गुलाब कितना खिला है।”
पर नीरा कहती, “दादी, आप भी न, फूलों से बातें करती हैं! इसमें क्या रखा है?”
एक दिन दादी बीमार हो गईं। डॉक्टर ने आराम करने को कहा, और बग़ीचा सूना हो गया। पौधे मुरझाने लगे। नीरा ने पहली बार देखा कि दादी का चेहरा उतरा हुआ है।
उसे दादी की बातें याद आईं — “पौधे भी हमारी तरह जीते हैं, उनसे प्यार करो तो मुस्कराते हैं।”
नीरा ने मोबाइल एक ओर रखा और बग़ीचे में जाकर धीरे-धीरे पानी देना शुरू किया। हर रोज़ एक नया पौधा, एक नया स्पर्श, एक नई मुस्कान दादी के चेहरे पर।
कुछ हफ्तों में बग़ीचा फिर से हरा-भरा हो गया। नीरा अब हर पौधे को नाम देती, उनसे बातें करती, और दादी के पास बैठकर किस्से सुनती।
एक शाम, दादी ने नीरा का हाथ पकड़कर कहा,
“अब मेरा बग़ीचा तुझे सौंप रही हूँ। इसमें तेरा भी प्यार है अब।”
नीरा मुस्कराई और बोली, “अब ये मेरा भी है, दादी। और आप भी।”
अब नीरा रोज़ सुबह सूरज के साथ उठती, पौधों को पानी देती, सूखे पत्ते हटाती और कुछ देर दादी के पास बैठकर उनकी कहानियाँ सुनती। दादी की तबीयत भी पहले से बेहतर हो गई थी।
इसी बीच स्कूल में ग्रीन स्कूल प्रोजेक्ट शुरू हुआ। हर छात्र को अपने मोहल्ले में कोई हरियाली से जुड़ा काम करना था। नीरा ने सोचा — “मैं अपने बग़ीचे को मोहल्ले के बच्चों के लिए खोल दूंगी, ताकि सब कुछ सीखें और मिलकर कुछ नया करें।”
पहले दिन वह मोहल्ले के बच्चों के पास गई — “चलो मेरे घर! मैं तुम सबको फूलों के नाम और लगाने का तरीका सिखाऊँगी।”
कुछ बच्चे हँसे — “तू अब ‘दादी’ बन गई है क्या? हमें खेलने दे!”
नीरा दुखी हुई, पर हार नहीं मानी। अगले दिन वो अकेले बग़ीचे में काम करती रही। दो दिन बाद एक लड़का, आयुष, चुपचाप आकर बोला — “मैं गुलाब लगाना सीखना चाहता हूँ, नीरा।”
धीरे-धीरे दो और बच्चे जुड़ गए। नीरा ने उन्हें मिट्टी तैयार करना, बीज बोना, और नामपट्टियाँ लगाना सिखाया। दादी खिड़की से देखतीं और मुस्करातीं।
एक दिन स्कूल की टीम निरीक्षण करने आई। उन्होंने देखा कि मोहल्ले के तीन बच्चे मिलकर बग़ीचे में काम कर रहे हैं, पौधे हरे-भरे हैं और हर एक के पास नामपट्टी लगी है।
टीचर ने पूछा, “ये सब किसका आइडिया था?”
नीरा बोली, “मेरी दादी ने मुझे सिखाया, और मैंने इनसे बाँटा। अब ये सबका बग़ीचा है।”
स्कूल ने ‘सर्वश्रेष्ठ ग्रीन प्रोजेक्ट’ का पुरस्कार नीरा को दिया। नीरा ने ट्रॉफी दादी के हाथ में दी और कहा, “ये आपकी जीत है।”
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”