मैं अपने अंतर्मन में सोच रहा था_एक यात्रा वृत्तांत
मैं अपने अंतर्मन में सोच रहा था : एक यात्रा वृतांत
एनजीओ के डायरेक्टर श्री बीपी राय चिकित्सक भी थे।आध्यात्मिक पुरुष थे।स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते थे।
कृष्णा देवी नैनो देवी अनाथालय के संचालक थे।उनके पत्नी भी चिकित्सक थे। 5 पुत्रियां थी।
मुझे देख कर फूला न समाए।अत्यंत प्रसन्न हुए।
वार्ता शुरू हुई।मेरी हिंदी सुनकर बहुत तारीफ हुई कि “शुद्ध हिंदी बोलते हो”
फिर आगे कहा आप इतने दूर से अकेले आ गए।
सामान्य चर्चाएं होती रहीं।
विशेष सत्र में सामाजिक सेवा संस्थान कैसे बनाएं,उनके कार्यशैली,संस्थान की देखरेख,लक्षित समूह को लाभ कैसे दिलाएं इन सब बिंदुओं पर विशेष चर्चा हुई।
अगले दिन सुबह उनके चिकित्सालय विजिट करने गए ।उन्होंने मेरी जिज्ञासा व ज्ञान पिपासु देखकर न केवल इंजेक्शन लगाना, सिखाया बल्कि रोग व रोगों के रोकथाम,मरीजों की देखरेख आदि सिखाया।
आध्यात्मिक ज्ञान के बारे में चर्चा शुरू हुई।उसने मुझे पूछा कैसी ज्ञान चाहिए ? मैने कहा मुझे संपूर्ण ज्ञान चाहिए। उन्होंने मुझे कर्म योग,भक्ति योग,राज योग आदि की पुस्तकें दी। मै प्रतिदिन अध्ययन किया और उन पर चर्चाएं हुई।तब मुझे स्वामी विवेकानंद के जीवन दर्शन के प्रति लगाव व उनके सेवा भावना से बहुत आकर्षित हुआ।
अब मैं आध्यात्मिक, मानसिक,और शारीरिक रूप से परिपक्व होने लगा था।
पंजीकृत संस्थान की बैठकें हुई मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला।
सबको बोलने का मौका दिया गया सबको मैने सुना।अब मेरी बारी आई।
पुस्तकें पढ़ – पढ़ कर सूचनाएं इक्ट्ठी हो चली थीं।मैने भी भर भर के स्वामी विवेकानंद और उनके गुरुभक्ति विषय पर सभा को संबोधित किया।
सभागार तालियों से गूंज उठी। यह देखकर मैं आनंदित और आश्चर्यचकित भी हुआ।
अब मेरी ग्रीष्मावकाश समाप्त होने वाली थी।
अपने गुरुदेव से आशीर्वाद लिया उनके प्रति कृतज्ञता जाहिर की आभार जताया।
उनके परिवार के सभी सदस्यों ने मुझे शुभकामनाएं दी ,अंगवस्त्र प्रदान किए।बहुत सम्मान किए।अपने गुरु माता आंखों से आंसू रोक न सकी थी।
मैं मन ही मन सोच रहा था कि भारत देश के सब परिवार मेरे घर जैसा है। गुरुदेव के पास रह जाता तो क्या होता….. आदि।लेकिन आगे की शिक्षा के लिए मुझे आना पड़ा।
क्रमशः …..
साहित्यकार
कविराज संतोष कुमार
मिरी”विद्या वाचस्पति”
नवा रायपुर छत्तीसगढ़