योग करो निरोग रहो
योग करो रहो निरोग
अंगों को जोड़ो अंगों से
मन को जोड़ो वृत्ति से
वृत्ति को जोड़ो चित्त से
चित्त को जोड़ो बुद्धि से
बुद्धि को जोड़ो आत्मा से
आत्मा को परम आत्मा से
फिर लगेगा कि पूरा संसार एक है।
तन शुद्ध मन शुद्ध
विचार शुद्ध भाव शुद्ध
न हो कोई द्वंद
तन में मन में वचन में
एकाकार हो।
प्रकृति के साथ हों
ज्ञान के प्रकाश हो
हर विषम परिस्थिति का
तात्कालिक समाधान हो।
समृद्ध हो प्रबुद्ध हो
अनवरत बने रहो
सांसों का आना जाना
इसी पर बने रहो।
सदा मौन रहो
अपने भीतर ही जागो
ऊर्जा चक्रों को जगाओ।
सोए हुए चक्रों को बार बार उठाओ।
जागृत चक्र
महाशक्ति पुंज
तत्क्षण सब उपलब्ध
ईश्वर का अहो भाव
धन्य है इस प्रयोगशाला रूपी तन का
यही सच्चा योग है।
साहित्यकार
कविराज संतोष कुमार
मिरी “विद्या वाचस्पति”
नया रायपुर छत्तीसगढ़