आई बसंत ऋतु
हरियाली की चादर ओढ़े, आई बसंत बहार।
कोयल की मीठी बोली में, गूंजे प्रेम अपार।
फूलों की मुस्कान बिखेरे, रंग-बिरंगी शाम,
प्रकृति सजी धजी लगे, जैसे हो कोई धाम।
सरसों लहराए खेतों में, पीली चुनर ओढ़,
खुशबू से भर जाए पवन, उड़ता जाए छोड़।
भंवरे गाते गीत नए, तितली करे नृत्य,
धरती मां के कण-कण में, भर जाए नव सृजन तृप्त।
बसंत है उल्लास का पर्व, आशा का संचार,
मन में लाए नई उमंगें, करे हृदय प्रसार।