माँ के लाल फिर से पुकारे जा रहे हैं
जीत का जश्न मनाने सारे जा रहे हैं
असलियत में तो जंग हारे जा रहे हैं।
नजर है जमीन पर चंद पूंजीपतियों की
रोज कितने आदिवासी मारे जा रहे हैं।
कुछ राज है उस पार के हमले न रुक रहे
इस पार से घुसपैठ के इशारे जा रहे हैं।
सहारों पे यकीन बहुत करना नादानी है
छोड़कर मझधार में किनारे जा रहे हैं।
वो तो अंधेरी बस्तियों में रोशनी बरसाए
हिस्से में जिनके चांद सितारे जा रहे हैं।
उठो इंक़लाब लाओ फिर से बदलाव का
माँ के लाल फिर से पुकारे जा रहे हैं।
‘विनीत’ नही छिप पायेगा नूर-ए-हिज़ाब में
सबके चेहरों से नक़ाब उतारे जा रहे हैं।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’