गर्मी पड़ती जब अधिक
गर्मी पड़ती जब अधिक,व्याकुल होते लोग।
एसी कूलर का बहुत,करते हैं उपयोग।
करते हैं उपयोग, चिल्ड पानी भी पीते।
ले विद्युत आधार,अधिकतर जनगण जीते।
नहीं लगाते वृक्ष, बने क्यों हैं हठधर्मी।
कहता कविवर ओम,घटे तब कैसे गर्मी।।
जंगल काटे नित मनुज,करे ईंट शृंगार।
इससे बढ़ता ताप है,गर्मी का यह सार।
गर्मी का यह सार,बताते सारे ज्ञानी।
स्थिति आज खराब,करे मानव मनमानी।
पाने को अति अर्थ,प्रकृति से करता दंगल।
कहता कविवर ओम, बचाओ कुछ तो जंगल।।
पारा निशदिन बढ़ रहा,व्याकुल है संसार।
सूर्य बढ़ाता अति तपिश,कैसे हो उपचार।
कैसे हो उपचार,सोचती सारी जनता।
वृक्षों से हो प्यार,भाव बस यही उमड़ता।
गर्मी जाती बीत,भूलते निश्चय सारा।
जिससे हर इक साल, ताप का बढ़ता पारा।।
डॉ ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम