शायद तुम यह सोच रही हो कि---------- ?
मैं आज तुमको,
क्यों नहीं निहार रहा हूँ,
क्यों नहीं कर रहा हूँ कोशिश,
तुमसे बात करने की,
क्यों नहीं देख रहा हूँ आज मैं,
टकटकी लगाए तेरे चेहरे को,
शायद तुम यह सोच रही हो।
क्यों शांत हूँ मैं आज,
अपने लबों को मौन दिये,
क्यों नहीं झगड़ रहा हूँ ,
मैं आज तुमसे,
क्यों नहीं चिढ़ा रहा हूँ,
मैं आज तुमको,
शायद तुम यह सोच रही हो।
क्यों नहीं कर रहा हूँ स्पर्श,
मैं आज तुम्हारे शरीर को,
क्यों नहीं सहला रहा हूँ,
मैं आज तुम्हारे गालों को,
क्यों नहीं लगा रहा हूँ हाथ,
मैं आज तुम्हारे लबों को,
क्यों नहीं खेल रहा हूँ,
मैं आज तुम्हारी जुल्फों से,
शायद तुम यह सोच रही हो।
क्यों हो गया हूँ खफ़ा,
मैं आज तुमसे इतना,
क्यों हो गई है हिकारत,
मुझको आज तुमसे इतनी,
क्यों दूर हो गया हूँ आज,
मैं तुम्हारा साथ-हाथ छोड़कर,
क्यों नहीं हंसा रहा हूँ आज,
मैं तुमको हमेशा की तरह,
शायद तुम यह सोच रही हो।
लेकिन जब तुमको,
मुझपे नहीं है विश्वास,
समझती नहीं जब तू ,
मेरे जज्बात और दर्द,
और करना चाहती हो तुम,
मुझको बदनाम, दुश्मन समझकर,
तो मैं क्यों तुमपे विश्वास करूँ,
क्यों खुद को बदनाम-बर्बाद करूँ,
तुमसे मैं प्यार करके,
मैं क्यों आज इतना बदल गया हूँ,
शायद तुम यह सोच रही हो।
शिक्षक एवं साहित्यकार
गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)