कोई है
मैं जब से पढ़ रहा हूँ
पुरुषों की तुलना में
नारियों की औसत उम्र
कम है
सम्भव है परम्परानुसार
कुछ ज्यादा उम्र की
पुरुषों से ब्याहने के कारण
श्वेत वस्त्रों में
लिपटी हुई वे औरतें
हमारे गाँव की विधवाएँ हैं,
वे और कोई नहीं
हमारी दादियाँ चाचियाँ
भाभियाँ बहनें और माँएँ हैं।
वे उजाड़ रंग ओढ़े हुए
सिसकियाँ भरती हैं,
लोगों के ताने और
वैधव्य का दंश झेलती हैं।
वे टूटे हुए काँच और
फूटे हुए बर्तन की तरह हैं
वे दूर-दूर रहती हैं
जो सगुन के कामों में
हिस्सा नहीं लेती हैं।
मैं सोचता हूँ
आखिर कब बदलेंगी
ये रूढ़ परम्पराएँ?
कोई है
जो इन रूढ़ परम्पराओं को
बदल करके
एक नया नियम चलाए?
डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
( साहित्य वाचस्पति )
इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फॉउंडेशन द्वारा
भारत के 100 महान व्यक्तित्व में शामिल
एक साधारण व्यक्ति।