दौलत निज आदर्श की
दौलत निज आदर्श की,जीवन का आधार।
ज्ञानी मानव यह सदा,करता है स्वीकार।।
दौलत निज आदर्श की,करती बहुत कमाल।
रखता इसका मान जो,चले नियत ही चाल।।
खोकर निज आदर्श को,होता कब उत्थान।
माया मिलती ही भले, लुटता है सम्मान।।
नहीं बचे आदर्श जो,जीवन है बेकार।
जीवन जीते जीव बन, तजकर सत आधार।।
आदर्शों को खो मनुज,जीता ज्यों बिन प्राण।
ज्ञानी ध्यानी कह गए,होता कब कल्याण।।
धर्म-कर्म आदर्श से,चलता जो परिवार।
ईश कृपा बरसे सदा, पाये जीवन सार।।
राम-कृष्ण आदर्श का,पालन कर संसार।
द्वेष-दर्प से मुक्त हो,करे उचित व्यवहार।।
आदर्शों की छाँव में, खिलता जीवन साज।
निर्मल रहता मन सदा,निर्मल हो हर काज।।
डॉ ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम
शिक्षक व साहित्यकार
तिलसहरी, कानपुर नगर