"गाँव गाँव नहीं रहा"
“गाँव गाँव नहीं रहा”
वो मकान सारे कच्चे
पर थे जो रिश्ते सच्चे
गली-मोहल्लों में चहुँओर
वो खेलते-कूदते बच्चे
जिसे अन्तस में महसूसे
वो प्रेम-सद्भाव नहीं रहा,
लगता है कि
अब गाँव गाँव नहीं रहा।
“गाँव गाँव नहीं रहा”
वो मकान सारे कच्चे
पर थे जो रिश्ते सच्चे
गली-मोहल्लों में चहुँओर
वो खेलते-कूदते बच्चे
जिसे अन्तस में महसूसे
वो प्रेम-सद्भाव नहीं रहा,
लगता है कि
अब गाँव गाँव नहीं रहा।