Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
23 May 2025 · 1 min read

जीवन नहीं पार्श्व देह

///जीवन नहीं पार्श्व देह///

प्रेम तुष्टि प्रेम पुष्टि ,
प्रेम ही प्राण की वृष्टि है।
इन सबकी सम्मिश्र,
निधि ही से तो सृष्टि है।।

सृष्टि के सकल समाकर ही,
बनते हैं व्यष्टि आधार।
स्नेह हृदय का ज्वार नहीं,
सकल समष्टि पारावार।।

दो स्पंदन जहां मिलते पुलकित,
वहां जीवन होता अनुनाद सना।
अनुनादित जीवन सकल प्रेमधुरी,
तब मिलता जीवन अवलंब घना।।

जहां दृष्टि नहीं वहां राह नहीं,
निर्मल प्रेम स्नेह की थाह नहीं।
छल प्रपंच-प्रणय अनुगाह नहीं,
मालिन दृष्टि मन सद्-वाह नहीं।।

नहीं निर्मल प्रेम नहीं शुचि सनेह,
वह कर्मण कैसे श्रेयश गेह।
सद्-वरण करो तुम मानवता का,
यह जीवन नहीं है पार्श्व देह।।

स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)

Loading...