जीवन पावन मुस्काएगा
कहाँ कौन बच पाएगा
जब मौसम आग लगाएगा
नदियों की पीड़ा का क्रंदन
सागर में जाग जाएगा
पल्लवित प्रलय होगा विशाल
लहरों का तांडव छाएगा।
अंधी प्रगति का शीशमहल
एक झोंके में ढह जाएगा
पर्वत छांटे जंगल काटे
किसके आश्रय में जायेगा
सब हैं शामिल बर्बादी में
कौन किसे समझाएगा
कोई प्रकृति का रखवाला
हाँ सच्ची बात बताएगा
थम सकता है विध्वंस अगर
कुदरत को अमल में लाएगा
प्रत्येक जीव की है धरती
कोई एक नही टिक पाएगा
जो समझ गया मानव ‘विनीत’
जीवन पावन मुस्काएगा।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’