Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
22 May 2025 · 1 min read

जीवन पावन मुस्काएगा

कहाँ कौन बच पाएगा
जब मौसम आग लगाएगा

नदियों की पीड़ा का क्रंदन
सागर में जाग जाएगा

पल्लवित प्रलय होगा विशाल
लहरों का तांडव छाएगा।

अंधी प्रगति का शीशमहल
एक झोंके में ढह जाएगा

पर्वत छांटे जंगल काटे
किसके आश्रय में जायेगा

सब हैं शामिल बर्बादी में
कौन किसे समझाएगा

कोई प्रकृति का रखवाला
हाँ सच्ची बात बताएगा

थम सकता है विध्वंस अगर
कुदरत को अमल में लाएगा

प्रत्येक जीव की है धरती
कोई एक नही टिक पाएगा

जो समझ गया मानव ‘विनीत’
जीवन पावन मुस्काएगा।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

Loading...