एक डाल पर बैठी चिड़िया बोली...
एक डाल पर बैठी चिड़िया बोली…
एक डाल पर बैठी चिड़िया,
धीरे-धीरे स्वर में बोली —
“सुन भाई! मैं भी सजीव हूँ,
मुझमें भी प्राणों की डोरी।
जेठ की तपती दोपहरी,
झुलसा दे तन-मन को सारी,
मुझे भी है सावन की आशा,
हरियाली की मधुर पुकार।”
सूख रही हैं नदियाँ देखो,
पर्वत सिमटे, छाँव भी खोई।
विकास के नाम पे इंसानों ने,
धरती की पीड़ा तक ना सोची।
तपती भूमि पुकारे तुमको,
क्या उसका भी कोई नाता नहीं?
मैं भी इस जग की संतान हूँ,
मुझमें भी जीवन समाया कहीं।
“तुम भी जियो, मुझे भी जीने दो,
हम सबका है एक ही संसार।
अगर न उगेगा पेड़ यहां तो,
कहाँ मिलेगा जीवन आधार?”
कटा- कटा पेड़ देखा कर रोई मैं,
देखा पर्यावरण का हाहाकार।
अब तो समय है जागो सब मिल,
धरती को दो फिर से प्यार।
“मुझे बचाओ, मेरी है विनती,
मैं भी हूँ जीवन की पहचान।
आओ फिर से वृक्ष लगाएँ,
सँवारे धरती, सहेजे प्राण।”