नवनिधि क्षणिकाएँ---
नवनिधि क्षणिकाएँ—
22/05/2025
आखिरी कविता कहती है
चलो सो जायें
कल के लिए भी
विचारों को आराम दो।
शब्दावली कम पड़ते है
अपनी कथा- व्यथा के लिए
अक्सर मेरी लेखनी
भूखी ही सो जाती है।
भावनाओं की मरुभूमि में
प्यासा भटकता है कवि मन
किसी चातक की तरह
अंतहीन प्रतीक्षा में।
जो भी अनुकूलता रही
स्वयं को सजाया हमने
परंतु किसी की पसंद में
आज तक खरे नहीं उतरे।
ँये पंक्ति मेरी ही है
जो कभी लिखी थी मैंने
सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हूँ मैं
वर्तमान की इस सदी का।
ये ढोंग बहुत हुआ यारों
सारी पोल खुल चुकी है
इन महंगे पोशाकों के भीतर
सुंदर सूरत की भीतर
कोई हैवान रहता है।
वो मेरी कमाई खा रहे
मुझे ही आँख दिखाते है
ये गनीमत समझो
तुम्हारी आँख अभी भी
सलामत है अपनी जगह।
वो हमेशा कहा करता था
तुम्हारे बिना अधूरा हूँ
सारी दुनिया देखती है आज
उसके घर की रौनकें।
मुझे अच्छा नहीं लगता
बड़ी मुश्किल से कह पाता हूँ
!! शुभयामिनी !!
— डॉ. रामनाथ साहू “ननकी”
संस्थापक, छंदाचार्य, (बिलासा छंद महालय, छत्तीसगढ़)
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