शायरी
इस चका चौथ में हम कहां आ गए
इन अंधेरों ने तो रोशनी छीन ली
सैर सपनों का हमको कराते रहे
ख्वाब दिखला के मेरी खुशी छीन ली
आदमी बनकर जो था मिलना मिलाना मेरा
हर घरों में था जो आना-जाना मेरा
जिसको मिलकर बनाएं समंदर सभी
उसी सागर ने हमसे नदी छीन ली
साहिल अहमद