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25 May 2025 · 87 min read

मुहम्मद के उन्मादी अनुभव — चैप्टर–3

मानव के मन के बारे में हुए नए अनुसंधानों से मुहम्मद के रहस्यमयी अनुभवों पर प्रकाश डाला जा सकता है। मुहम्मद ने अपने इन अनुभवों का वर्णन गूढ़ भाषा में किया है। लोग उसे झूठा न कहें, इसलिए उसे जो कहना था, अल्लाह से कहलवाया।

‘जो बड़ा जबरदस्त है और जब ये (आसमान के ऊंचे (मुशरको) किनारे पर था तो वह अपनी (असली सूरत में) सीधा खड़ा हुआ (6)। फिर करीब हो (और आगे बढ़ा) (7)। (फिर जिब्राईल व मुहम्मद में) दो कमान की दूरी रह गई ( 8 ) । बल्कि इससे भी निकट था (9) अल्लाह ने अपने बन्दे की तरफ जो ‘वही’ भेजी सो भेजी (10)। तो जो कुछ उन्होंने देखा उनके दिल ने झूठ न जाना (11)। तो क्या वह (रसूल) जो कुछ देखता है तुम लोग उसमें झगड़ते हो ( 12 ) । और उन्होंने तो उस (जिब्राईल) को एक बार (शबे-मेराज) और देखा है ( 13 ) । सिदतुल – मुन्तहा के नज़दीक (14) उसी के पास तो रहने की बहिश्त है ( 15 ) । जब छा रहा था सिदरा पर जो छा रहा था (16)। (उस वक्त भी) उनकी आंख न तो और तरफ माएल हुई और न हद से आगे बढ़ी ( 17 ) । और उन्होंने निश्चित ही अपने परवरदिगार (की कुदरत) की बड़ी बड़ी निशानियां देखीं ( 18 )।’ (कुरान 53:6-18)

एक और जगह मुहम्मद ने अपने कठपुतली अल्लाह से अपने दृश्यीय अनुभव की पुष्टि कराई : ‘और बेशक उन्होंने जिब्राईल को आसमान के खुले किनारे पर देखा है।’ (कुरान. 81-23) एक हदीस में मुहम्मद के अनुभवों को इस तरह बताया गया है:

जब मैं टहल रहा था तो आसमां से एक आवाज सुनी। मैं ऊपर आकाश में टकटकी लगाकर देखने लगा। तब मुझे वही फरिश्ता दिखाई दिया जो हिरा की खोह में मेरे पास आया था। वह फरिश्ता जमीं और आसमां के बीच एक कुर्सी पर बैठा था। यह देखकर मैं डर से बेहोश होकर गिर गया। तब मैं अपनी बीबी के पास गया और बोला, ‘मुझे कपड़े से ढंको ! मुझे कपड़े से ढंको! उसने मेरे ऊपर कंबल डाला।

जब किसी ने पूछा, ‘वह दैवीय प्रेरणा तुम्हें कैसे मिली ?’ मुहम्मद ने जवाब दिया:

‘कभी-कभी लगता था कि जैसे कान में बड़े-बड़े घंटों की टंकार हो रही हो। मैं तो थोड़ी देर के लिए बिलकुल सुन्न जैसा हो जाता था। फिर जब इस स्थिति से उबरता था तो दैवीय प्रेरणा मुझे मिलती थी। कभी-कभी फरिश्ते इंसानों के वेश में मेरे पास आते थे और मुझसे बात करते थे और मैं उनके संदेश सुनता रहता था।’ आयशा ने कहा: ‘एक दिन जबरदस्त ठंड थी। मैंने देखा कि रसूल फरिश्तों से बात कर रहे हैं और जब वो सामान्य हालत में आए तो वो पसीने से तरबतर थे।

जैद इब्ने साबित ने वर्णन किया है: ‘रसूल जो वही अर्थात इल्हाम (रहस्योद्घाटन ) करते थे, मैं उसको लिखता था। जब रसूल को अल्लाह का संदेश मिलता था तो वे ऐसा महसूस करते थे, जैसे सीने में आग लगी हो और उनके शरीर से मोती की तरह पसीने की बूंदें टपकने लगती थीं।

इब्ने-साद दावा करता है: ‘जब रसूल को इल्हाम (अल्लाह का संदेश मिलना) होने वाला होता था तो उन्हें बेचैनी होने लगती थी और उनका चेहरा तन जाता था। उन्होंने फिर बताया, ‘जब रसूल पर इल्हाम यानी दैवीय प्रेरणा मिलती थी तो कुछ घंटों के लिए वे ऐसे हो जाते थे, जैसे कि नींद में हों। बुखारी कहता है: ‘अल्लाह के रसूल को दिव्य ज्ञान सपने में होता था और सपने में देखी गई बात सच होती थी।

मुस्लिम द्वारा लिखी एक हदीस में लिखा है: ‘रसूल की बीबी आयशा कहती हैं: रसूल को अल्लाह का संदेश स्वप्न में मिलता था और उस समय उन्हें और कुछ नहीं, बल्कि जैसे भोर की किरण प्रकाश पुंज लाती है, वैसे ही ज्ञानपुंज दिखता था।

तबरी लिखता है: ‘रसूल ने कहा, ‘मैं खड़ा था, तभी अचानक घुटनों के बल गिर पड़ा और मेरा शरीर कांपने लगा।

बुखारी ने भी लंबी हदीस लिखी है और यह बताया है कि मुहम्मद को कैसे अल्लाह का संदेश मिलता था। आयशा ने लिखा है:

अल्लाह के रसूल को अल्लाह का संदेश ख्वाब में मिलता था और वे ख्वाब ऐसे होते थे, जो सच होते थे। दरअसल, रसूल सपना नहीं देखते थे, बल्कि वह होने वाला सच देखते थे। वह अक्सर हिरा की खोह में एकांत में चले जाते थे, जहां कई दिन और रात अल्लाह की इबादत करते रहते थे।

वह अपने साथ कई दिनों के खाने-पीने का सामान ले जाते थे। सामान खत्म होने पर वे फिर अपनी बीबी खदीजा के पास वापस आते थे और सामान लेकर चले जाते थे। हिरा की गुफा में लंबे इबादत के दौरान एक दिन वे सत्य से परिचित हुए। फरिश्ता आया और उनसे (अशिक्षित मुहम्मद) से पढ़ने को बोला। रसूल ने जवाब दिया, ‘मुझे पढ़ना नहीं आता है।’ फरिश्ते ने इतनी जोर से पकड़कर मुझे भींचा कि मैं चिल्ला पड़ा। तब उसने मुझे छोड़ दिया और फिर से मुझे पढ़ने को बोला। मैंने फिर कहा, ‘मुझे पढ़ना नहीं आता ( मैं क्या पढूं ?)।’ उसने दूसरी बार जोर से पकड़कर दबाया और पढ़ने को बोला। उसने छोड़ा तो मैं फिर बोला, मुझे पढ़ना नहीं आता ( मैं क्या पढूं ?) ।’ उसने तीसरी बार फिर पकड़कर दबाया और बोला, ‘पढ़ो अपने अल्लाह का नाम लेकर पढ़ो। जिस अल्लाहने पूरी कायनात, हर चीज बनाई है। जिस अल्लाह ने खून के थक्के से इंसान बनाए। उस परवरदिगार का नाम लेकर पढ़ो। तुम्हारा अल्लाह कृपालु है, जिसने कलाम के जरिए तालीम दी। उसी ने इंसान को वह बातें बताईं, जिनको वह कुछ जानता ही न था।’ (कुरान. 96:1-5)

इसके बाद अल्लाह के रसूल दैवीय प्रेरणा लेकर लौटे। उनके गले की नसें डर के मारे तन गई थीं। उन्होंने घर में प्रवेश किया और खदीजा से बोले, ‘मुझे ढंक दो! मुझे ढंक दो!’ खदीजा ने उन्हें कंबल उढ़ाया और तब रसूल बोले: ‘ऐ खदीजा, मुझे क्या हो गया ?’ इसके बाद रसूल ने खदीजा को अपने साथ हुई पूरी घटना बताई और बोलेः ‘डर लग रहा है कि मुझे कुछ हो जाएगा।’ खदीजा ने कहा, ‘कभी नहीं! तुम्हें कुछ नहीं होगा। अच्छा सोचो। अल्लाह तुमको कभी नीचा नहीं दिखाएगा। तुम तो अपने नाते-रिश्तेदारों, दोस्तों के साथ अच्छा व्यवहार रखते हो। सच बोलते हो । दीन-हीनों की मदद करते हो। मेहमानों की खातिर करते हो। किस्मत के मारों की सहायता करते हो ।’

इसके बाद खदीजा उसे अपने चचेरे भाई वरका बिन नोफेल बिन असद बिन अब्दुल बिन उज्जा बिन कुसई के पास ले गई। वरका उसके पिता के भाई का बेटा था, जो इस्लाम के आने के पहले ईसाई हो गया था और इंजील को अरबी में लिखता था । वह कहता था कि उसे अल्लाह ने ऐसा करने के लिए कहा है। वह एक बुजुर्ग व्यक्ति था और अंधा था। खदीजा ने उससे कहा, ‘ऐ भाई! अपने भतीजे की कहानी सुनो।’ वरका ने पूछा, ‘बोलो भतीजे तुमने क्या देखा ?’ रसूल ने जो देखा था, उसे बताया। वरका ने कहा, ‘यह वही जिबराइल अर्थात फरिश्ता है, जो अल्लाह के रहस्यों को जानता है और अल्लाह ने इसे ही मूसा के पास भेजा था।’ काश! मेरी उम्र थोड़ी और लंबी होती और मैं उस समय होता, जब तुम्हारे अपने लोग तुम्हें इसके लिए भगाने की कोशिश करेंगे। रसूल ने कहा, ‘क्या वे लोग मुझे देश निकाला देंगे ?’ वरका ने कहा, हां, जब भी कोई इंसान इस तरह की बात करता है तो लोग उसके शत्रु बन जाते हैं। उस नाजुक वक्त में यदि जिंदा रहा तो मैं मजबूती से तुम्हारा साथ दूंगा। लेकिन इसके कुछ ही दिन बाद वरका की मृत्यु हो गई और कुछ समय के लिए दिव्य संदेश का आना भी बंद हो गया। रसूल इससे बहुत दुखी हुए।

मैंने (खदीजा) से कई बार सुना है कि उनके (रसूल) मन में कई बार पहाड़ियों से नीचे कूदकर जान देने का विचार आया। लेकिन जब भी वह कूदने के लिए पहाड़ी की चोटी पर जाते तो जिब्राईल प्रकट होता और कहता, ‘ऐ मुहम्मद ! तुम वास्तव में अल्लाह के पैगम्बर हो। इसके बाद उनका मन शांत होता और वे पहाड़ी से नीचे आते, फिर घर पहुंचते। जब लंबे समय तक मुहम्मद को अल्लाह का संदेश नहीं मिलता तो वे ऐसा ही करते। पर जैसे ही पहाड़ी की चोटी पर पहुंचते जिब्राईल आकर फिर वही बात कहता। (इब्ने अब्बास इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं: अल्लाह अंधियारे को चीर कर उजियारा करता है। वह अल-असबह है, जिसका अर्थ है कि वही सूरज को रोशनी देता है और चंदा को चांदनी ।)

मुहम्मद को रसूल मानने का वरका का दावा बकवास है। दावा यह भी किया जाता है कि वरका ने यह दावा इंजील के अध्ययन के आधार पर किया था। किसी भी धर्मग्रंथ में ऐसा कुछ नहीं है, जो मुहम्मद की ओर इशारा करता हो। वरका मर चुका था और मुहम्मद उसके नाम पर कोई भी झूठ बोल सकता था, ठीक उसी तरह जैसे कि वह अपने दादा के बारे में कहता था कि वे उसको बड़ा किस्मत वाला कहते थे। वरका के साथ बिल्कुल वैसा नहीं था, जैसा कि उसकी परजीवी खदीजा उसके झूठ को मंडित करती थी। उस समय पर भी मुहम्मद ऐसा ही झूठा दावा करता है, जब वह बुसरा में खदीजा की सेवा में गया था। उसने कहा था कि जैसे ही बुसरा के बाहरी इलाके में कारवां पहुंचा, वह एक पेड़ की छाया में बैठ गया और तभी एक फकीर ने उसे पहचान लिया। फकीर ने पूछा, ‘पेड़ के नीचे वह कौन बैठा है ?’ कथित तौर पर उस फकीर ने खदीजा के एक युवा नौकर मईसरह से यह पूछा। मईसरह व्यापारिक यात्रा में मुहम्मद के साथ जाता था। मईसरह ने जवाब दिया, ‘वह कुरैश कबीले का आदमी है।’ तब फकीर ने कहा, ‘अरे, पेड़ के नीचे बैठा इंसान कोई साधारण मनुष्य नहीं है, वह तो अल्लाह का पैगम्बर है।’ यह संभवत मुहम्मद की मनगढ़ंत कहानी थी कि फकीर ने उसके चारों ओर एक ऐसा बादल देखकर कहा था, जो उसे चटखती धूप से बचा रहे थे। फकीर ने पूछा, ‘क्या इस इंसान की आंखों में हल्की लाली और चमक रहती है।’ मईसरह ने हां में जवाब दिया तो उसने कहा, ‘वह निश्चित रूप से अल्लाह का अंतिम पैगम्बर है। जो भी उस पर भरोसा करता है, वह बधाई का पात्र है।

एक जगह उसने दावा किया कि उसके कंधों के बीच जो बड़ा तिल है, वह उसके पैगम्बर होने की निशानी है। मुझे तो अभी तक किसी धर्मग्रंथ में लिखा नहीं मिला कि कंधों के बीच तिल अथवा आंखों का लाल रहना पैगम्बरी के चिन्ह होते हैं। पलकों के आसपास जलन के कारण होने वाली ब्लैफ्रॉइटिस (blepharitis) नामक बीमारी से आंखें लाल रहती हैं।

एक प्रकार के ब्लैफ्रॉइटिस (blepharitis) की बीमारी में मेइबोमियन (meibomian) ग्रंथि ठीक से काम नहीं करती है, जिससे आंखों के आसपास रोसासिया (rosacea) और सेबोरिक डरमेटाइटिस की समस्या पैदा होती है। रोसासिया में चेहरा लाल हो जाता है। अबू तालिब के बेटे अली ने मुहम्मद के चेहरे को रैडिश व्हाइट बताया है। मुहम्मद जानता था कि उसके अनुयायी भोले हैं, इसलिए वह उनको अपनी कपोल कल्पित बातें सुनाता रहता था। यहां तक उसने अपनी बीमारी के लक्षणों को भी पैगम्बरी की पहचान बताया। अगर यह कहानी सच होती तो मईसरह वह पहला व्यक्ति होता, जो मुहम्मद के संप्रदाय में शामिल होता। पर मईसरह का दोबारा कहीं उल्लेख तक नहीं हुआ है। ऊपर दी गई हदीस बताती है इस्लाम में खदीजा की भूमिका महत्वपूर्ण थी। जब मुहम्मद को वहम हुआ कि उसके ऊपर शैतानों का साया है तो वह खदीजा ही थी, जिसने उसे आश्वस्त किया कि अल्लाह ने उसे अपने रसूल के रूप में चुना है और उसके पागलपन को और हवा दी। मुहम्मद के कुछ मतिभ्रम तो खुली आंखों से देखकर होते थे, जबकि कुछ वह सपने में देखकर पालता था और कुछ सुनकर। इब्ने इसहाक लिखता है:

जब अल्लाह ने मुहम्मद पर अपनी कृपा बरसाने की इच्छा की और उन्हें रसूल बनाया तो वह अपने काम के सिलसिले में यात्रा में रहते थे। पर जब मक्का की उन घाटियों में स्थित कंदराओं में पहुंचते थे, जहां न कोई मकान दिखता, न इंसान और न पेड़-पौधे तो वहां आवाज आती, ‘हे अल्लाह के पैगम्बर, तुम पर अल्लाह की कृपा है!’ रसूल जब अपने आगे-पीछे और ऊपर-नीचे नजर दौड़ाते तो उन्हें कोई नजर नहीं आता था, बस आसपास पत्थर और पेड़ दिखते थे।

मुहम्मद और भी कई विचित्र ख्वाब देखा करता था। अबू हुरैरा ने बयान किया है: रसूल ने एक बार नमाज पढ़ी और बोलेः ‘शैतान आया और नमाज में खलल डालने की कोशिश की। पर अल्लाह मेरे साथ था और उसने मुझे ताकत दी। मैंने उसका गला मरोड़ दिया। बेशक मैंने सोचा कि उसे मस्जिद के खंभे से बांध दूं, ताकि तुम लोग सुबह
उठो तो उसे देखो। तभी मुझे पैगम्बर सुलेमान की वह बात याद आई, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘मेरे प्रभु! मुझे ऐसा साम्राज्य प्रदान करो, जो मेरे बाद किसी और का न हो।’ तब अल्लाह ने शैतान को वापस भेजा और वह शर्म से सिर वहां से झुकाए चला गया। मानसिक विकार का एक लक्षण यह भी होता है कि ऐसा व्यक्ति वास्तविकता और कल्पना में भेद नहीं कर पाता है।

आयशा बताती है:
‘अल्लाह के रसूल पर ऐसा जादूटोना कर दिया गया था कि वो सोचते थे कि उन्होंने अपनी बीवियों के साथ संभोग किया है, हालांकि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता था। (सूफियान ने कहा इस इंद्रजाल का प्रभाव ऐसा था कि इसे समझना आसान न था।) ‘

तभी एक दिन रसूल ने कहा, ‘ऐ आयशा, क्या तुम्हें मालूम है कि मैंने अल्लाह से कुछ पूछा था और उसने उस संबंध में कुछ निर्देश दिए हैं? दो आदमी मेरे पास आए और उनमें से एक सिरहाने बैठ गया और दूसरा पांव के पास । सिरहाने बैठे व्यक्ति ने दूसरे से पूछा, ‘इस इंसान को क्या हुआ है ? दूसरे ने जवाब दिया कि इस पर जादू का प्रभाव है। फिर पहले वाले ने पूछा, इस पर किसने जादू किया है ? उत्तर मिला, ‘कभी यहूदियों की चापलूसी करने वाले बनू जुरैक कबीले के लबीद बिन आसम ने।’ पहले वाले ने पूछा: किस चीज से जादू किया उसने ? दूसरा बोला: कंधे में एक बाल फंसा था, वही लेकर उसने जादू कर दिया। पहले ने पूछाः वह कंघा कहां है ? उत्तर मिला, जरवान के कुएं में एक पत्थर के नीचे खजूर के पेड़ की छाल में छिपाकर रखा गया है।’ रसूल उस कुएं पर गए और उन चीजों को देखा और बोले ‘यह वही कुआं है, जो मुझे सपने में दिखा था। कुएं का पानी मेहंदी के अर्क सा दिखता था और इस पर जमा खजूर का पेड़ शैतान के सिर जैसा दिख रहा था।’ रसूल ने कहा, ‘फिर हमने वहां से वह बाल निकाल लिया।’ मैंने (आयशा) रसूल से कहा, ‘तुम नशरा (जादू निकलवाना ) से अपना इलाज क्यों नहीं करते ?’ उन्होंने कहा, ‘अल्लाह ने मुझे ठीक कर दिया है। मैं नहीं चाहता कि हमारे लोगों के बीच बुराई फैले।

एक अन्य हदीस में बताया गया है:
अल्लाह के रसूल को जब इल्हाम (अल्लाह का पैगाम मिलना) हुआ तो वे कपड़ों से पूरी तरह ढंके थे। याला ने कहा, ‘मैं देखना चाहता हूं कि रसूल का इल्हाम कैसे होता है। उसने (उमर) ने कहा: ‘क्या तुम यह देखना चाहते हो ? उमर ने एक कोने से कपड़ा हटाया तो मैंने देखा कि रसूल की नाक से खर्राटा भरने की आवाजें आ रही हैं। फिर इस व्यक्ति ने कहा कि उसे लगा, यह ऊंट की आवाज थी।

एक और हदीस में लिखा है:
जब जिब्राईल ने अल्लाह के रसूल को दिव्य संदेश सुनाया तो उसने (रसूल) अपनी जीभ और होठ हिलाये । ऐसा लग रहा था कि जैसे वे बहुत कष्ट में हों। स्थिति को देख पता चलता था कि रसूल अल्लाह के पैगाम को सुन रहे थे।

यहां विभिन्न हदीसों में उल्लिखित इल्हाम के दौरान मुहम्मद पर पड़ने वाले शारीरिक व मनोवैज्ञानिक प्रभावों की सूची दी गई है।

1. किसी फरिश्ते, प्रकाश अथवा आवाजें सुनने की दृष्टि (मतिभ्रम) 2. शरीर में ऐंठन और पेडू में तेज दर्द और बेचैनी 3. अचानक चिंता या भय के आगोश में आ जाना 4. गले की मांसपेशियों में खिंचाव 5. होठों को चबाना अथवा अनियंत्रित रूप से होठ हिलना 6. जाड़े के दिनों में भी पसीना आना 7. चेहरा फक्क पड़ जाना 8. मुखमंडल बिगड़ जाना 9. हृदय की धड़कन तेज हो जाना 10. ऊंट की तरह खर्राटे भरना 11. ऊंघाई आना 12. आत्मघाती विचार आना

ये सारे टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी (टीएलई) के लक्षण हैं। इस बीमारी का एक लक्षण यह भी है कि बिना पूर्वाभास के साथ यह सब के होने लगता है। मुहम्मद के इन रहस्यमयी अनुभवों में ये सारे लक्षण मिलते थे। मुहम्मद के रहस्यमयी अनुभव कुछ और नहीं, बल्कि इस बीमारी का प्रकोप था।

बुखारी में लिखा है:
अल्लाह के रसूल जब इल्हाम में विराम की अवधि के बारे में चर्चा कर रहे थे तो उन्होंने बताया, ‘एक बार मैं टहल रहा था। अचानक आसमान में मैंने कुछ आवाज सुनी। मैंने ऊपर देखा तो हैरत में पड़ गया। वहां वही फरिश्ता दिखा, जो मेरे पास हिरा की खोह में आया था। वह आसमान और धरती के बीच एक आसन पर बैठा था। मैं उससे डर गया और घर आया। बीबी से बोला, छिपाओ मुझे, छिपाओ मुझे।

आत्महत्या के विचार
इतिहासकार बताते हैं कि मुहम्मद ने कई बार आत्महत्या का प्रयास किया था, पर हर बार जिब्राईल उसे बचा लेता। पहले तो उसने सोचा कि वह कवि या भविष्यवक्ता हो गया है: ‘मैंने एक कवि या ज्योतिषी से अधिक किसी और से घृणा नहीं की। मैं इनमें से किसी की ओर देखना तक पसंद नहीं करता। मैं किसी कुरैश को अपने इल्हाम के बारे में कभी नहीं बताऊंगा। मैं पहाड़ी पर जाकर कूद जाऊंगा और जान दे दूंगा। मैं इससे मुक्ति पा जाऊंगा। मैं ऐसा करने गया भी, पर पहाड़ी के आधे रास्ते पर पहुंचा था कि आकाश से एक आवाज आई, ‘ऐ मुहम्मद ! तुम अल्लाह के पैगम्बर हो और मैं जिब्राईल हूं।’ मैंने ऊपर देखा तो इंसान के रूप में जिब्राईल दिखा। वह क्षितिज पर अपने पांव रखे था।’ मैं रुका और उसकी ओर देखा। उसने मेरी ओर देखा तो मेरा ध्यान उस ओर से हट गया, जो मैं करने जा रहा था। मैं बिल्कुल किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में खड़ा रहा और आसमान की ओर ताकता रहा। मैंने जिब्राईल को बिलकुल वैसा ही देखा, जैसा पहले देख चुका था।

इसको समझने के लिए यह जानना होगा कि मुहम्मद को वही दिखता था, जो उसके दिमाग में चलता रहता था। जिस दिशा में वह सोचता था, उसको उसी से जुड़ी भ्रामक तस्वीर दिखने लगती थी। कुरान के कवर पेज पर जिब्राईल को एकसाथ कई जगहों पर प्रकट होते दिखाया जाता है। पर यह वैसा नहीं है, जैसा मुहम्मद अपने अनुभवों में देखता था। मुहम्मद ने जो देखा और बताया, वह दृष्टिभ्रम के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। दृष्टि भ्रम मानसिक चोटों, संवेदी तंत्रिकाओं को हानि, साइकैडेलिक (psychedelic ) ड्रग और माइग्रेन सहित अनेक मनोचिकित्सीय स्थितियों में होता है। ऐसे बीमार को कुछ मतिभ्रम जरूर होते हैं (जैसे कि मरीज प्रकाश, रंग अथवा ज्यामितीय आकृतियों को देखता है)। इस प्रकार का मतिभ्रम खोपड़ी के पीछे के हिस्से में मिर्गी जैसा दौरा पड़ने से होता है । जटिल दृष्टि भ्रम व विभ्रम, जैसा कि मुहम्मद अनुभव करता था, कुछ समय के लिए मस्तिष्क की तंत्रिकाओं में रक्त प्रवाह बाधित होने और स्नायु संबंधी विकार जैसे पर्किंसन रोग व कूतफेल्ट जैकब (Creutzfeldt-Jakob) रोग में होता है। इस प्रकार के मतिभ्रम की समस्या से पीड़ित व्यक्ति को जानवरों, इंसानों अथवा फरिश्ते या जिन्न जैसी रहस्यमयी ताकतें दिखती हैं। इस प्रकार के मतिभ्रम में श्रवण संबंधी, स्वाद संबंधी, सूंघने संबंधी और दर्द या सुन्न होने जैसी समस्याएं होती हैं। दर्द या सुन्न होने अथवा श्रवण संबंधी मतिभ्रम मुख्यतः दिमाग के एक हिस्से में दौरा पड़ने के कारण होती हैं। मुहम्मद को हिरा की खोह में फरिश्ते जिब्राईल द्वारा पकड़ने और कसकर भींचने तथा इसके बाद पेडू में तेज दर्द का ऐसा अनुभव हुआ था कि उसे लगा वह मर जाएगा। यह बताता है कि मुहम्मद इस समस्या से पीड़ित था। जब तक आपको यह नहीं लगेगा कि वह प्रधान देवदूत अर्थात फरिश्ता जिब्राईल थोड़ा पागल था, आप यह नहीं समझ पाएंगे कि मुहम्मद को जो हिरा की खोह में अनुभव हुए थे, वे क्या थे ।

अनुसंधान वैज्ञानिक स्काट एट्रन व्याख्या करते हैं: मन व मस्तिष्क में अचानक बदलाव से श्रवण संबंधी, स्वाद संबंधी, स्पर्श संबंधी व सूंघने संबंधी इंद्रियों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और इससे आवाज, संगीत, मनोदशा अथवा शारीरिक शिथिलता की समस्या पैदा हो सकती है। उदाहरण के लिए, मस्तिष्क के मध्य भाग से वह तंत्रिका जुड़ी होती है, जो किसी वस्तु की गंध को महसूस कर आपको सुगंध या दुर्गंध का अहसास कराती है। पर यदि इस भाग की इस तंत्रिका को सीधे उत्तेजित कर दिया जाए तो मस्तिष्क में तीव्र गंध का संदेश पहुंचने लगेगा और प्रभावित व्यक्ति परेशानी का अनुभव करेगा। धार्मिक अनुष्ठानों में अगरबत्ती व सुगंधित पदार्थ मस्तिष्क के इस भाग को उत्तेजित करते हैं। इससे आपके आसपास का माहौल व आपका ध्यान एक विशेष रंग में रंगा दिखने लगता है। टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी (टीएलई) के प्रभाव के दौरान मस्तिष्क के निश्चित भाग में अचानक बिजली जैसा करंट लगता है और इससे कई तरह के दौरे एक साथ पड़ते हैं, जिससे एक खुशबूदार आभामंडल महसूस होने लगता है। मुहम्मद बताता था कि जिबराइल के 600 पंख थे। ऐसा वास्तव में होगा, यह विश्वास करना मुश्किल लगता है।

मुहम्मद जिस घोड़े बुराक पर बैठकर रातभर में जेरुसलम और जन्नत की सैर कर आने का दावा करता था, उसका सिर इंसान का और पंख बाज का बताता था। जब कोई बेतुकी चीजों में भरोसा नहीं करेगा, इस तरह के काल्पनिक दावों को स्वीकार नहीं करेगा और यह स्पष्ट है कि मुहम्मद मतिभ्रम की बीमारी से पीड़ित होने के कारण इस तरह की चीजें देखता था।

मिस्र के मुस्लिम विद्वान व इतिहासकार हैकल जन्नत की सैर पर जाने के दौरान मुहम्मद द्वारा देखे गए फरिश्ते का वर्णन यूं करते हैं: ‘पहला जन्नत बिलकुल शुद्ध चांदी सा चमकीला था और उसके मेहराबों से सोने की चेन से बंधे सितारे लटक रहे थे।’ (यह बात सिद्ध करती है कि मुहम्मद को यह समझ ही नहीं थी कि सितारे क्या होते हैं। वह सितारों को आसमान में लटकी क्रिसमस की लाइटों जैसा होने की कल्पना कर रहा था।) यह प्टोलेमी के ब्रह्मांड विज्ञान में किए गए दावे जैसा है और मुहम्मद के समय में इस पर सामान्यतया विश्वास किया जाता था।) ‘और वहां मौजूद प्रत्येक फरिश्ता बुरी आत्माओं को जन्नत के पवित्र निवास स्थानों तक पहुंचने और दैवीय रहस्यों को सुनने से रोकने को तत्पर था।’ (ये तर्कहीन बात कुरान में भी लिखी गई है। कुरान में कहा गया है कि जन्नत में जिन्न एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर दैवीय सभा की बातचीत सुनने की कोशिश करते थे। लेकिन फरिश्ते उन पर मिसाइल की तरह सितारों को छोड़ते थे, जिसकी मार से वे गिर जाते थे। प्राचीन काल में लोग मानते थे कि उल्का पिंड वे सितारे होते हैं, जिनका प्रयोग अल्लाह के शिकार को मारने में किया जाता है। BS)

हैकल आगे उल्लेख करते हैं: “वहां (जन्नत में) मुहम्मद ने आदम को सलाम किया। वहां पर छह अन्य पैगम्बरों नूह, हारून, मूसा, दाऊद, सुलेमान, इद्रीस (इनोच), याहिया (जॉन द बापटिस्ट) और ईसा से भेंट हुई। इन्हें भी मुहम्मद ने सलाम किया। उन्होंने मौत के फरिश्ते इसराईल को देखा। इसराईल इतना विशालकाय था कि दोनों आंखों के बीच मीलों का फासला था। (मोटे तौर पर यह दूरी धरती और चांद के बीच की दूरी की दस गुनी थी।)। उसके पास एक लाख फौज की बटालियन थी और वह पैदा होने वाले और मरने वालों के नाम किताब में चढ़ाता रहता था। (क्यों न इसराइल को कोई कम्प्यूटर दान कर दें ताकि वह काम के बोझ से हल्का हो सके ?) । उन्होंने आंसू के फरिश्ते को देखा, जो दुनिया में हो रहे पाप पर रो रहा था। प्रतिशोध के फरिश्ते को देखा, जिसका चेहरा सख्त था और चमड़ी मोटी थी। यह फरिश्ता आग के तत्वों को नियंत्रित करता था और ऐसे सिंहासन पर बैठा था, जिससे आग की लपटें निकल रही थीं। एक ऐसा विशालकाय फरिश्ता भी दिखा, जिसके शरीर का आधा हिस्सा आग और आधा हिस्सा बर्फ से बना हुआ था। आग और बर्फ से बने इस फरिश्ते को घेरकर कुछ लोग बैठे थे, जो एक साथ कह रहे थे, ऐ अल्लाह, तूने आग और बर्फ को एक साथ कर दिया। अपने सभी सेवकों को एकसाथ अपने नियमों का पालन करवाने वाला बनाया। जन्नत के सातवें दरवाजे के उस पार जहां न्याय की आत्मा एक फरिश्ते के रूप में निवास कर रही है और यह फरिश्ता आकार में पूरी कायनात से विशाल है, इसके 70 हजार सिर हैं, प्रत्येक सिर में 70 हजार मुख हैं, प्रत्येक मुख में 70 हजार जीभ हैं और प्रत्येक जीभ 70 हजार भाषाओं में परवरदिगार का गुणगान कर रही है।

यह बात अपने आप में विरोधाभासी मुहम्मद के पास असाधारण कल्पनाशील शक्ति थी। हालांकि उसकी सोच विकृत थी। हकीकत की दुनिया में ऐसे विकृत इंसान को जगह देना तो दूर, मन में भी नहीं लाना चाहिए।

— मुहम्मद ने ऐसा फरिश्ता देखा, जो ब्रह्माण्ड से भी बड़े आकार का था। इस फरिश्ते के 70 हजार सिर, प्रत्येक सिर पर 70 हजार चेहरे (4,900,000,000: अर्थात चार अरब 90 करोड़ चेहरे थे।

— प्रत्येक चेहरे पर 70 हजार मुख (343,000,000,000,000: अर्थात 34 पदम, 30 खरब मुख) प्रत्येक मुख में 70 हजार जीभ (मतलब 24,010, 000,000,000,000,000 जीभ)

— प्रत्येक जीभ 70 हजार भाषाएं बोलती है (मतलब 1,680,700,000,000,000,000,000, 000 भाषाएं)

अल्लाह को ऐसी कौन सी आवश्यकता पड़ती होगी कि वह इतना विशाल दैत्याकार फरिश्ता लाखों भाषाओं में अपने गुणगान के लिए बनाएगा? कोई भी इंसान ऐसी बातें करने वाले प्राणी को गंभीर मतिभ्रम से पीड़ित रोगी के रूप में देखेगा। कल्पना कीजिए, कोई व्यक्ति अपने घर में बड़ी संख्या में कम्प्यूटर और टेपरिकार्डर लगवा रहा हो और उसकी प्रोग्रामिंग ऐसी करवा रहा हो कि विश्व की सभी भाषाओं में उसका स्तुतिगान लगातार होता रहे। क्या ऐसी कल्पना करने वाला पागल नहीं कहा जाएगा ? अल्लाह और कुछ नहीं, बल्कि मुहम्मद द्वारा अपने अहंकार को तुष्ट करने और अपनी उन्मादी इच्छाओं को पूरा करने के लिए गढ़ी गई कल्पना है। अल्लाह के मनोविज्ञान में मुहम्मद का मनोविज्ञान छिपा है। एक मनोरोगी के रूप में जितना मुहम्मद अपनी तारीफ का भूखा रहता था और उतना ही उसका वह अल्लाह भी, जिसे उसने स्वयं ही रचा था। एक प्रभावशाली औरत के साथ शादी के बावजूद अपनी ही नजर में उसकी कोई अहमियत नहीं थी और उसके अपने लोग भी उसकी आलोचना किया करते थे। उसकी बीबी खदीजा उसकी वहमी अनूभूति की व्याख्या पैगम्बर होने के लक्षण के रूप में करती थी और यह अनुभूति ही उसके उन्मादों को तुष्ट करने का माध्यम होता था। जब उसे इस तरह का वहम होना बंद हो जाता था तो वह निराश हो उठता था।

वैकनिन कहते हैं:
इस तरह के किसी मनोरोगी के भावनात्मक पक्ष में अवसाद बड़ा घटक होता है। हालांकि, अवसाद की स्थिति तब आती है, जब उसकी अजीबोगरीब इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती है। यह समस्या अधिकांशतः वाहवाही, प्रशंसा और अहमियत से भरे दिनों को लेकर विषाद की स्थिति से पैदा होती है। अवसाद एक तरह से आक्रामकता का रूप है। जब अवसाद आक्रामकता का रूप लेता है तो यह उस व्यक्ति को न कि उसके आसपास की चीजों को प्रभावित करता है। दमित और हिंसक व्यवहार मनोरोग (नार्सिसिज्म) व अवसाद दोनों के लक्षण हैं। हालांकि केवल खुद से प्यार करने वाला अर्थात नार्सीसिस्ट अवसाद की अवस्था में भी अपनी आत्मपूजक प्रवृत्ति को नहीं भूलता है, जिसमें आडम्बर, अधिकार का भाव, घमंडीपन और करुणा की कमी जैसे लक्षण होते हैं।

यह न केवल मुहम्मद के अवसाद के कारण और उसके मन में लगातार आने वाले आत्महत्या के विचार की व्याख्या करता है, बल्कि वह आत्महत्या करने के बिंदु तक क्यों नहीं पहुंचा यह भी बताता है। नाससिस्ट शायद ही कभी खुदकुशी करता है। यह सुनना बड़ा अजीब लगता है कि मुहम्मद ने कई बार खुदकुशी की कोशिश की होगी और हर बार जिब्राईल उसे बचाने आया होगा, फिर इसके बाद भी वह फिर से खुदकुशी का प्रयास करता होगा। नार्सीसिस्ट खुदकुशी नहीं करता है, बल्कि लोगों की सहानुभूति हासिल करने के लिए बार-बार खुदकुशी-खुदकुशी रटता है।

‘डैड मैन्स मिरर’ में अगाथा क्रिस्टी सवाल उठाती हैं: ‘एक ऐसा इंसान जो स्वयं को सर्वाधिक महत्वपूर्ण, सबसे बड़ा और ब्रह्मांड का केंद्र बिंदु मानता हो, खुदकुशी कैसे करेगा ?’ वह तो उन लोगों को चींटी की तरह मसल देने की इच्छा रखता था, जो उसकी अय्याशी अथवा मनमानेपन में खलल डालने का प्रयास करते थे। ऐसे इंसान ऐसा करना आवश्यक और उचित मानते हैं। ऐसा व्यक्ति आत्मघात करेगा ? ऐसा तो संभव ही नहीं है। 191

नार्सीसिस्ट खुदकुशी क्यों नहीं कर सकता? इस प्रश्न के उत्तर में वैकनिन कहते हैं, क्योंकि ऐसे व्यक्ति बहुत पहले ही मर चुके होते हैं। नार्सीसिस्ट असल में जिंदा लाश होते हैं। वह लिखते हैं, ‘बहुत से विद्वानों और चिकित्सकों ने नार्सीसिस्ट के मन में खालीपन को ढूंढने की कोशिश की। यह बात निकल कर आई कि ऐसे व्यक्ति की मरी हुई आत्मा के अवशेष इतने सख्त, रूखे, खंडित, हीनभावना के शिकार और दमित हो चुके होते हैं कि वह व्यवहारिक दुनिया में किसी लायक नहीं रह जाता है।

वैकनिन कहते हैं, द्विध्रुवीय विकार के रोगियों को अवसाद से बाहर लाने के लिए दवा की जरूरत होती है, लेकिन नार्सीसिस्ट को इससे उबरने के लिए दवा के बजाय ऐसी नार्सिस्टिक खुराक की जरूरत होती है, जो उन्हें उन्मादी सुखबोध करा सके।

टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी
सबसे पहले हलीमा या उसके शौहर ने पहचाना कि मुहम्मद को मिर्गी के दौरे पड़ते थे। जब वह पांच साल का था, तभी उसमें दौरा पड़ने के लक्षण दिख गए थे। थियोफेंस, (752-817) पहले इतिहासकार थे, जिन्होंने सबसे पहले दावा किया था कि मुहम्मद मिर्गी का मरीज था। आज इस दावे की पुष्टि की जा सकती है। इंटरनेशनल लीग अगेंस्ट इपीलैप्सी (आईएलएई) ने 1985 में टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी (टीएलई) नामक बीमारी को परिभाषित किया। इसमें बताया गया कि मस्तिष्क के मध्यभाग या पीछे के भाग से अचानक और कुछ देर तक कई बार टीएलई का दौरा पड़ता है। यदि दौरा हल्का है तो व्यक्ति अचेत नहीं होता है, पर यदि गंभीर होता है तो मरीज की चेतना कमजोर पड़ जाती है।

दरअसल, तेज दौरे के समय मनुष्य की चेतना लुप्त होने लगती है, क्योंकि इसका प्रभाव मस्तिष्क के एक भाग से दूसरे भाग में पहुंच जाता है और स्मृति ह्रास की ओर ले जाती है।

मुहम्मद को पड़ने वाला मिर्गी का दौरा दोनों तरह का था। कभी दौरा पड़ने पर वह बेहोश होकर गिर जाता था और कभी वह होश में रहता था। एक हदीस में लिखा है कि काबा के निर्माण के समय जब मुहम्मद को अल्लाह का संदेश मिलने वाला था तो वह बेहोश होकर जमीन पर गिर गया। उसकी आंखें खुली हुई थीं और वह आसमान में ताक रहा था। इस वक्त उसकी चेतना लुप्त हो गई थी। यह मिर्गी का दौरा था।

ईमेडिसिन डॉट कॉम के मुताबिक, ‘ईईजी पर टैम्पोरल इंटरेक्टिकल इपीलैप्टीफार्म एबनॉर्मलिटीज के 90 प्रतिशत मरीजों का इतिहास दौरे पड़ने का होता है।’ मुहम्मद को बचपन से ही दौरे पड़ते थे। उसने देखा कि सफेद वस्त्रों में आए दो व्यक्तियों ने उसका सीना चीरा और दिल को बर्फ से धोया। अमेरिकन न्यूरोसर्जन हार्वे कशिंग एक ऐसे बच्चे के बारे में बताते हैं, जिसके मस्तिष्क के दाहिने हिस्से में एक गांठ थी, जिसके चलते उसे सफेद वस्त्र पहने किसी व्यक्ति का त्रिआयामी चित्र दिखता था।

आयरिश-अमेरिकन न्यूरोलॉजिस्ट राबर्ट फास्टर कैनेडी (1884-1952) वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने श्रवणदृश्यीय प्रकृति के विभ्रम की पहचान की, जिसका केंद्र मस्तिष्क में था।

अपनी युवावस्था के बारे में बात करते हुए मुहम्मद ने कहा: कुरैश कबीले में बच्चों के साथ मैं भी था। हम सब बच्चों ने खेलने के लिए पत्थर लिया हुआ था। मैं भी सबकी तरह कभी आगे जाता तो कभी पीछे हमने अपनी कमीज उतारकर गले में बांध ली थी। तभी एक अदृश्य आत्मा ने मुझे जोर से थप्पड़ मारा और बोला: अपनी कमीज पहनो। मैंने जल्दी से कमीज और कसकर बांध लिया। फिर इसके बाद पहन लिया और कंधे पर पत्थर रखकर अकेले चलने लगा।” ऐसा प्रतीत होता है कि मुहम्मद के विचारों में जो लोग आते थे, वे भी उतने ही हिंसक और बदतमीज थे, जितना मुहम्मद था।

टैम्पोरल लोब सीजर के लक्षण
दिमाग में दौरा पड़ने के पहले चेताने वाले लक्षण दिख सकते हैं, जैसे असामान्य उत्तेजना, पेट में गुदगुदी जैसा महसूस होना, विभ्रम या भ्रम (दृष्टि संबंधी, श्रवण संबंधी, घ्राण संबंधी, स्वाद संबंधी अथवा महसूस करने संबंधी)

ऐसा लगना जैसे वर्तमान में हो रही बातें या घटनाएं पहले भी हुई हैं, बीते दिनों की यादें अथवा भावनात्मक चोट की याद आना, इस समय हो रही किसी भी घटना के प्रति भावनात्मक आवेग उठना आदि। मुहम्मद को जब दौरा पड़ता था तो ये सब लक्षण दिखते थे।

मिर्गी का प्रभाव आंशिक होने पर चेतना बनी रहती है, लेकिन गंभीर प्रभाव होने पर दौरा पड़ने के समय चेतनाशून्यता की स्थिति आ जाती है। इसके दूसरे लक्षण सिर में असामान्य गतिविधि होना और आंखों का कुछ देर के लिए भेंगा होना भी है। जब काबा बन रहा था तो मुहम्मद को इस प्रकार के दौरे पड़ते थे। मांसपेशियों में लगातार खिंचाव के कारण शरीर के किसी भाग किसी हाथ, किसी पैर, चेहरे के किसी हिस्से या शरीर के किसी और अंग पर प्रभाव पड़ना टीएलई बीमारी के लक्षण हैं। इस बीमारी के अन्य लक्षणों में पेट में दर्द होना या मरोड़ होना, उबकाई आना, पसीना होना, चेहरा फक्क पड़ना, हृदय की धड़कन तेज हो जाना, देखने, सुनने, बोलने, सोचने अथवा व्यक्तित्व में गड़बड़ी आना आदि है। निस्संदेह संवेदी विभ्रम (दृश्य, श्रवण, स्पर्श आदि) बड़े लक्षण हैं।

अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध डेनिश इपीलैप्टाजिस्ट एवं इस विषय पर कई किताबों के लेखक डॉ. मोगेंस डैम आंशिक दौरे को इस तरह परिभाषित करते हैं: ‘मानसिक लक्षणों के साथ सिम्पल पार्शियल सीजर (दौरा) के दौरान महसूस हुई बातें इसका प्रभाव समाप्त होने के बाद भी याद रह सकती हैं और प्राचीनकाल से ही इसे ‘प्रभामंडल’ के रूप में जाना जाता है। इस दौरान हुए अनुभव सपने देखने जैसा होता है। इस तरह का दौरा पड़ने के बाद शरीर में ऐंठन हो सकती है। दौरा पड़ने के समय रोगी सोचता है कि वह पागल हो जाएगा।

मुहम्मद भी सोचता था कि वह पागल हो रहा है। वह तो खदीजा थी, जो उसे दूसरी तरह समझाती थी और मुहम्मद के पागलपन को वह पैगम्बर होने का संकेत बताती थी। डॉ. डैम लिखते हैं: ‘इस विषय पर काफी चर्चा हुई है कि क्या मिर्गी से पीड़ित मरीज के व्यक्तित्व में कुछ खास तरह की गतिविधि दिखती है, जो उसे दूसरों से अलग करती है। खासतौर पर यह पाया गया कि टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी से पीड़ित लोग अन्य लोगों की तुलना में भावनात्मक रूप से अस्थिर होते हैं, उनका व्यवहार हिंसक होता है। कुछ मरीज आत्मकेंद्रित हो जाते हैं और अति संवेदनशील होकर पागलपन की हद तक पहुंच जाते हैं। हर बात को अपनी उपेक्षा, तिरस्कार या ताड़ना के रूप में लेने लगते हैं। हर बात पर उबलने लगते हैं। ऐसे लोग धार्मिक, रहस्यमय, दार्शनिक और नैतिक विषयों में अधिक रुचि रखते हैं। वह आगे वर्णन करते हैं कि इस बीमारी (टीएलई) से पीड़ित मनुष्यों के अक्सर अवसाद में जाने की आशंका होती है और विभ्रम व आत्मघाती विचार आते हैं। ऐसे व्यक्तियों को लगता है कि उन पर अत्याचार हो रहा है। हालांकि सीजोफ्रीनिया के मरीज जैसा ये अन्य लोगों से भावनात्मक रूप से कटते नहीं हैं, बल्कि दूसरों से उनके भावनात्मक संपर्क बने रहते हैं।

सीजोफ्रीनिया रोगी के विपरीत टीएलई से पीड़ित इंसान अपनी समस्या का समाधान स्वयं ही करता है। चूंकि बाद के वर्षों में मुहम्मद पर दौरा पड़ना बहुत कम हो गया था, इसलिए उसके साथ भी ऐसा ही हुआ होगा। हालांकि दौरे रुकने के बाद भी उसे जब भी आवश्यकता लगी तो कुरान की नई आयतें कहीं।

प्रारंभिक वर्षों में मुहम्मद द्वारा मक्का में लिखी गई आयतों और बाद के वर्षों में मदीना में लिखी गई आयतों के लहजे, भाषा और वाक्यविन्यास में बहुत अंतर है। मुहम्मद के पैगम्बरी जीवन के प्रारंभिक चरण में लिखे गए सूरा काव्यशैली में हैं। इन आयतों में लय है और वे छोटी, पर मर्मभेदी हैं। ये आयतें पवित्र व दानी होने, अनाथों को खाना खिलाने, गुलामों को मुक्त करने, धीरज व संयम बरतने, करुणा धारण करने आदि को प्रेरित करती हैं, हालांकि इनमें यह चेतावनी भी दी गई कि जो मुहम्मद की बातों पर यकीन नहीं करेंगे, वे दोजख में जाएंगे।

सूरा सूरज 91: उस वक्त का एक ठेठ सूरा है। इसमें अरब के लोगों में प्रचलित एक किवदंती के बारे में उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि अल्लाह ने समूद के लोगों को चेतावनी के लिए एक ऊंटनी को भेजा था। यह ऊंटनी पैगम्बर थी, जिसका समूद ने अपनी हठधर्मिता के चलते कत्ल कर दिया था। सूरज की क़सम और उसकी रौशनी की (1)
और चांद की जब उसके पीछे निकले (2)
और दिन की जब उसे चमका दे (3)
और रात की जब उसे ढांक ले (4)
और आसमान की और जिसने उसे बनाया (5)
और ज़मीन की जिसने उसे बिछाया (6)
और जान की और जिसने उसे दुरुस्त किया (7)
फिर उसकी बदकारी और परहेजगारी को उसे समझा दिया (8)
(कसम है) जिसने उस (जान) को (गुनाह से) पाक रखा वह तो कामयाब हुआ (9)
और जिसने उसे ( गुनाह करके) दबा दिया वह नामुराद रहा (10)
कौम मसूद ने अपनी सरकशी से (सालेह पैग़म्बर को जब उनमें का एक बड़ा बदबख्त उठ खड़ा हुआ झुठलाया, (11)
जब उनमें का एक बड़ा बड़बख्त उठ खड़ा हुआ (12) तो अल्लाह के रसूल (सालेह) ने उनसे कहा कि अल्लाह की ऊंटनी और उसके पानी पीने से तअर्रुज न करना (13)
मगर उन लोगों ने पैग़म्बर को झुठलाया और उसकी कूंचे काट डाली तो अल्लाह ने उनके गुनाहों के सबब उन पर अज़ाब नाज़िल किया फिर (हलाक करके) बराबर कर दिया (14)
और उसको उनके नतीजे का कोई खौफ तो है नहीं (15)

सूरा ‘सूर्योदय’ 113 : इसी समय का एक और उदाहरण है
खुदा के नाम से (शुरू करता हूं) जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम वाला है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं सुबह के मालिक (सूरज) की हर चीज़ की बुराई से (1)
जो उसने पैदा की पनाह मांगता हूं (2) और अंधेरी रात की बुराई से जब उसका अंधेरा छा जाए (3) और गन्डों पर फूंकने वालियों की बुराई से (4) (जब फूंके) और हसद करने वाले की बुराई से (5)

असल में मुहम्मद जब मक्का में था तो उसकी महत्वाकांक्षाएं अपने शहर और आसपास के लोगों तक सीमित थीं। उसने क़ुरान में लिखा और हमने तुम्हारे पास अरबी कुरान यूं भेजा ताकि तुम शहरों की मां मक्का में रहने वालों और इसके इर्द-गिर्द रहने वालों को डराओ और उनको कयामत के दिन से भी डराओ जिसके आने में कुछ भी शक नहीं। उस दिन एक फरीक (इस्लाम को मानने वाला) जन्नत में होगा और एक फरीक (सानी यानी इस्लाम को न मानने वाला) दोजख में होगा।

शहरों की मां उम्मुल कुरा मक्का को कहा जाता है। एक दूसरी आयत 204 में उसने कहा कि वह दुनिया में उन लोगों के लिए आया है, जिन्हें अल्लाह की ओर से अब तक इल्म नहीं हुआ है। इन आयतों के मुताबिक, यहूदियों और ईसाइयों से उसका कोई वास्ता नहीं है और उनको समझाने वह नहीं आया है। हालांकि जैसे-जैसे वक्त बीता, उसकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगीं तो आखिरकार उसने फरमान जारी कर दिया कि सभी या तो उसके आगे घुटने टेक दें या मरने के लिए तैयार हो जाएं। बाद की आयतें कानूनी फरमान जैसे हैं। इन आयतों में जो भाषा इस्तेमाल की गई है, वह ऐसी है जैसे कि कोई तानाशाह अपनी प्रजा के लिए कानून और राजाज्ञा जारी करता है और प्रजा को अन्य स्थानों पर फतह हासिल करने को उकसाता हो। ए. ए. ट्रिटन कहते हैं, ‘बाद की आयतों के वाक्य लंबे हैं और क्लिष्ट हैं, ताकि लोग उन्हें ध्यान से सुनें, वर्ना उसके मर्म को नहीं समझ सकेंगे। इनकी भाषा चलते-चलते गद्य की हो जाती है, जो लयबद्ध शब्दों में पिरोए गए हैं। इन आयतों की विषयवस्तु कानून, लोक आयोजनों पर टिप्पणियां, नीति कथन, रसूल के साथ नजर न मिलाने वाले लोगों, खासकर यहूदियों के लिए झिड़की और मुहम्मद की घरेलू परेशानियों को लेकर है। इन आयतों में उसकी कल्पना बहुत कमजोर है और पुराने वाक्यों को इस्तेमाल किया गया है, ताकि विचारों के अभाव को छिपाया जा सके। हालांकि कई जगहों पर पहले जैसी आक्रामकता दिख जाती है।

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि मुहम्मद के विभ्रम केवल फरिश्ते जिब्राईल को देखने के दावे तक सीमित नहीं थे। उसने जिन्न और शैतान को भी देखने का दावा किया है। एक बार, जब वह मस्जिद में नमाज पढ़ रहा था तो वह अपने हाथों को इस तरह हिलाने मोड़ने लगा, जैसे किसी अदृश्य व्यक्ति के साथ हाथापाई कर रहा हो। बाद में उसने कहा, ‘मेरे सामने शैतान आ खड़ा हुआ और इबादत में खलल डालने लगा, लेकिन अल्लाह ने मुझे ताकत दी और मैंने उसका गला मरोड़ दिया। बेशक मुझे लगा कि उसे मस्जिद के खंभों से बांध दूं, ताकि सुबह जब तुम लोग उठो तो उसे देख सको। पर तभी मुझे पैगम्बर सुलेमान का वह कथन याद आ गया, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘ऐ अल्लाह, मुझे एक ऐसा साम्राज्य प्रदान करो, जो मेरे बाद किसी और का न हो।’

तब अल्लाह ने शैतान को अपमानित करते हुए उसे वापस भेजा।

कई हदीसों में मुहम्मद ने जिन्न से अपने मुठभेड़ की बात बताई है। ऐसी ही एक कहानी में उसने दावा किया है कि उसने अपने शहर में पूरी रात जिन्नों को इस्लाम कबूल करवाने में बिताई थी। कुरआन में जिन्नों के बारे में कम से कम 30 बार उल्लेख हुआ है। यह बात जानने लायक है कि मुहम्मद बाइबिल के बारे में नहीं जानता था। सुलेमान एक राजा था, न कि पैगम्बर और उसने कभी कोई ऐसी बात नहीं की थी, जिसका दावा मुहम्मद ने किया था। सुलेमान ने ईश्वर से धनसंपदा के बजाय ज्ञान और बुद्धि मांगी थी। मुहम्मद ने यहां सुलेमान का नाम लेकर सल्तनत और ताकत की अपनी भूख प्रकट की है।

टीएलई के अन्य लक्षण
टीएलई की समस्या से पीड़ित लोगों में ये 5 इंटरिक्टल लक्षण नजर आते हैं (इंटरिक्टल अर्थात दौरा पड़ने और उससे पहले के बीच के वक्त में, न कि दौरा पड़ने के दौरान)

1. हाइपरग्रैफियाः हाइपरग्रैफिया में इंसान के दिमाग में ऐसी बातें घर कर जाती हैं कि वह अधिक समय डायरी या नोट लिखने में बिताने लगता है। भले ही ऐसा इंसान अनपढ़ हो, पर वो ऐसा करता है। मुहम्मद ने कुरान रचा और दूसरों से इसे लिखवाया।

2. हाइपर रिलीजिआसिटीः धार्मिक विश्वास गहरे ही नहीं होते हैं, बल्कि ब्रह्मांड अथवा वृहद अध्यात्मिक सिद्धांतों से जुड़े होते हैं। इसके मरीजों को ऐसा लगता है कि उनके पास विशेष दैवीय कृपा है। मुहम्मद निश्चित ही दर्शन और रहस्यवाद को लेकर असामान्य सोच वाला व्यक्ति था। इसी ने उसे नए मजहब के अविष्कार को प्रेरित किया।

3. क्लिंगीनेसः मुहम्मद जब बच्चा था तो अपने चाचा से लगाव को लेकर जो किस्से उसने सुनाए हैं, वे और अन्य किस्सों से यह तो पता चलता है कि वह भावनात्मक खालीपन को भरने के लिए सदा लालायित रहा, इसलिए जब भी उसकी उपेक्षा होती थी या उसकी बात नहीं मानी जाती थी तो वह स्वयं को अपमानित महसूस करता था।

4. यौन संबंधों में विकृत रुचिः औरतों के साथ यौन संबंध को लेकर मुहम्मद की सनक यह बताती है कि यौनक्रीड़ा में उसकी वासना लगातार बढ़ती गई, हालांकि साथ ही उसकी यौन दुर्बलता भी बढ़ गई और बाद के वर्षों में वह नपुंसक सा हो गया था। इसके बारे में हम बाद में चर्चा करेंगे।

5. हिंसक व्यवहार अथवा आक्रामकताः भावनाओं का आवेग अक्सर अस्थिर होता है असंतुलित भावनात्मक विकास वाले इंसान कभी अति उत्साह से भर जाते हैं तो कभी गुस्से और चिड़चिड़ेपन में उनका व्यवहार हिंसक हो उठता है। मुहम्मद कभी बिलकुल दोस्ताना व्यवहार करता, विशेषकर अपने साथियों से और अगले ही पल वह उन पर आगबबूला हो जाता था, जो उसकी बातों से असहमति रखते थे। बुखारी में कहा गया है: ‘यदि रसूल को कुछ नापसंद होता था तो उनके चेहरे पर उसके भाव आ जाते थे।

रात में जन्नत का सफर
मुहम्मद के मेराज अर्थात रात में जन्नत के कथित सफर के बहुत से किस्से हैं। इब्ने इसहाक ने मुहम्मद के साथियों, खासकर उसकी बीबी आयशा द्वारा बताई गई कहानियों के आधार पर इन रिवाजों के बारे में लिखा है। इब्ने-इसहाक के वर्णन के मुताबिक, मुहम्मद ने कहा: जब मैं हुजरे (कुठरिया) में सोया हुआ था, जिब्राईल आया और उसने अपने पैर से ठोकर मारकर मुझे हिलाया। मैं उठकर बैठा तो आसपास कोई नहीं दिखा। मैं फिर सो गया। वह फिर आया और पैरों से मुझे ठोकर मारकर जगाया। मैं फिर उठ बैठा, पर आसपास अब भी कोई नहीं दिखा। फिर तीसरी बार जिब्राईल आया और मेरी बांह पकड़कर उठाया। मैं उसके साथ खड़ा हो गया। वह मुझे मस्जिद के दरवाजे के बाहर ले आया। वहां एक अजीब तरह का सफेद रंग का जानवर खड़ा था। इस जानवर का आधा शरीर खच्चर और बाकी गधे का था। इसके दोनों ओर पंख थे, जिसकी सहायता से वह अपने पैरों को फैलाता था और जितनी दूर तक देख सकता था, उतनी दूर अगले पैरों को रखता था। उसने मुझे इस पर बिठाया। फिर वह (फरिश्ता) मुझे अपने करीब रखकर ले चला। जब मैं उस जानवर पर बैठने जा रहा था तो वह बिदकने लगा। इस पर जिब्राईल ने उसकी गरदन पर अपना हाथ फेरा और बोला: ओ बुराक, तुम रसूल के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हो, तुझे शर्म नहीं आती है ? अल्लाह की नजर में मुहम्मद से बढ़कर सम्मानीय कोई नहीं है। क्या इससे पहले मुहम्मद कभी तुम पर सवार हुए, नहीं न? फिर इस तरह का अशोभनीय व्यवहार क्यों कर रहे ? उस जानवर ने शर्म से सिर झुका लिया और उसका पूरा शरीर पसीने से तरबतर हो गया। वह खड़ा हो गया, ताकि मैं उसपे चढ़ सकूं।

इब्रे-इसहाक आगे लिखता है: ‘रसूल और जिब्राईल अपने रास्ते जा रहे थे। फिर वे जेरुसलम के मंदिर पहुंचे। वहां उन्हें पैगम्बरों की सोहबत में अब्राहम, मूसा और ईसा मसीह मिले। रसूल ने वहां इबादत में उन सब का इमाम बनकर प्रार्थना की। फिर उनके (मुहम्मद) के सामने दो कटोरे आए, जिसमें से एक में शराब और दूसरे में दूध भरा था। रसूल ने शराब का कटोरा छोड़कर दूध का कटोरा ले लिया और पिया। जिब्राईल ने कहा, ‘मुहम्मद तुम दुनिया के सबसे सत्य व प्राचीन धर्म और प्रकृति के रास्ते पर चल रहे हो। तुम्हारे अनुयायी भी इसी मार्ग पर चलेंगे। तुम्हारे लिए शराब हराम है।’ इसके बाद रसूल रात में ही मक्का लौट गए। वहां कुरैशों को रात की पूरी घटना बताई। अधिकांश लोगों ने मुहम्मद की कहानी को बकवास बताया और कहने लगे कि कारवां को मक्का से सीरिया जाने के लिए एक माह और लौटने में एक माह लगता है। मुहम्मा एक रात में यह यात्रा कैसे कर लेगा ?’ इब्ने साद कहता है: ‘यह कहानी सुनने के बाद जो लोग मुहम्मद के साथ आए थे और इस्लाम कबूल किया था, उनमें से बहुत से लोग मुरतद (धर्मद्रोही) हो गए और इस्लाम छोड़ दिया।’

कहा जाता है तब मुहम्मद ने इस्लाम छोड़ने वालों को जवाब देते हुए कुरान की यह आयत दीः ‘हमने यह सच सिर्फ तुम लोगों को बताया, ताकि तुम्हारे ईमान को परख सकें।

मुस्लिम इतिहासकारों ने अपने-अपने तरीके से इस किस्से में शब्दाडंबर का तड़का लगाकर इसे प्रमाणिक बताने की भरपूर कोशिश की है। इब्ने इसहाक ने कहा है कि लोगों ने एक रात में ही जेरुसलम की यात्रा कर मक्का लौट आने के दावे का सबूत मांगा तो रसूल ने जवाब में कहा कि यात्रा के समय उन्होंने अमुक घाटी में फलाने कारवां को गुजरते देखा। जिस जानवर पर वह (रसूल) सवारी कर रहे थे, उसने कारवां को डरा दिया और डर के मारे एक ऊंट बिदक कर लगाम तोड़कर भागने लगा। फिर मुहम्मद इस तरह बयान करता है, ‘मैंने उन लोगों (सबूत मांगने वालों) को दिखाया कि वह कारवां कहां था, क्योंकि मैं सीरिया के रास्ते पर जा चुका था। मैं मक्का से 25 मील की दूरी पर स्थित तिहामा के पास दजनान की पहाड़ियों में आगे बढ़ रहा था। मैंने बनू कबीले के एक कारवां को गुजरते देखा। मैंने देखा कि कारवां के लोग नींद में थे। उनके पास पानी का जार था, जो किसी चीज से ढंका था। मैंने ढक्कन खोलकर पानी पिया और फिर ढंक दिया। इसका सबूत यह है कि वह कारवां इस वक्त तनईम दरें के पास अल-बैदा से वापस आ रहा है। इस कारवां में दो ऊंट हैं, जिनमें से एक पर काले रंग का गट्ठर और दूसरे पर बहुरंगी गट्ठर लदा था।’ बैदा मदीना की तरफ मक्का के पास पहाड़ी है। तनईम मक्का की ऊंचाई पर स्थित था। लोग मुहम्मद के दावे को जांचने के लिए उस दर्रे की ओर भागे और इन्हें जो पहला ऊंट दिखा, वो वैसा ही था, जैसा रसूल ने बताया था। इन लोगों ने कारवां के लोगों से उस जार के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उसमें पूरा पानी भरा था और ढंका था। पर जब सुबह वे जगे तो घड़ा ढंका तो था, पर खाली था। इन लोगों ने उनसे भी इस बारे में पूछा, जो मक्का में थे तो मक्का के उन लोगों ने कहा कि बात सही है, वे डर गए थे और उनका एक ऊंट लगाम तोड़कर भागने लगा था। तभी इन लोगों ने एक आदमी को ऊंट को आवाज लगाते सुना, जिसके बाद वे ऊंट को पकड़ सके।

ये बातें मुहम्मद की मृत्यु के लगभग सौ साल बाद लिखी गईं। इतना समय बीत जाने के बाद इन बातों और दावों की सत्यता को सिद्ध करना संभव नहीं था। हालांकि जो तथ्य मुसलमान अब तक नहीं समझ पाएं हैं, वो यह है कि जेरुसलम के जिस मंदिर पर मुहम्मद ने जाने का दावा किया था, उस वक्त वहां कोई मंदिर था ही नहीं। मुहम्मद की अल-बुराक की यात्रा के 600 साल पहले ही रोमन ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। सन् 70 तक वहां मंदिर का कोई पत्थर तक नहीं था। बाइबिल के मुताबिक सुलेमान का मंदिर ईसा पूर्व दसवीं शताब्दी के आसपास बनाया गया था। सन् 691 में ज्यूपिटर के रोमन मंदिर की आधारशिला एक पहाड़ी के शिखर पर रखी गई। सन् 710 में उमैयद ने मंदिर की पहाड़ी के दक्षिणी छोर पर रोमन बैसीलिका के ऊपर अल अक्सा मस्जिद का निर्माण किया गया। यह अजीब बात है कि मुहम्मद को इस सफर में यह तो दिखा कि अमुक जनजाति का कारवां गुजर रहा था, पर यह नहीं दिखा कि जिस मंदिर में इबादत करने का उसने दावा किया, उसका अस्तित्व ही नहीं था। एक और गया। यह अजीब बात है कि मुहम्मद को इस सफर में यह तो दिखा कि अमुक जनजाति का कारवां गुजर रहा था, पर यह नहीं दिखा कि जिस मंदिर में इबादत करने का उसने दावा किया, उसका अस्तित्व ही नहीं था। एक और हदीस कहती है कि मुहम्मद के दावे को परखने के लिए अबू बक्र ने उससे जेरुसलम का वर्णन करने को कहा और जब उसने वर्णन किया तो अबू बक्र बोला, ‘सत्य है। मैंने परख लिया है कि तुम अल्लाह के रसूल हो।’ यह स्पष्ट नहीं है कि क्या अबू बक्र ने कभी जेरुसलम देखा था। अरबियों के लिए जेरुसलम कभी महत्वपूर्ण शहर नहीं रहा। हालांकि, यह भी आश्चर्यजनक है कि अबू बक्र ने जेरुसलम के उस मंदिर का कभी उल्लेख नहीं किया ।

ये सब किस्से मनगढ़ंत व संदिग्ध हैं और मुसलमानों ने अपने रसूल द्वारा कही गई विचित्र और बेसिर-पैर की कहानियों को विश्वसनीय बनाने के लिए इन्हें गढ़ा है।

इस किस्से का एक और संस्करण है, जिसे संभवतः सबसे अधिक विश्वसनीय माना जाता है। क्योंकि कुरान में भी इसका उल्लेख है। इस संस्करण में मुहम्मद कहता है:

जेरुसलम में मैंने जैसे ही अपना काम पूरा किया, एक सीढ़ी मेरे पास लाई गई। ऐसी सुंदर सीढ़ी मैंने पहले नहीं देखी थी। यह वह सीढ़ी थी, जो इंसान को तब दिखती है, जब मौत उसके पास आती है। मेरा साथी मुझे लेकर इस पर चढ़ा। हम इस पर ऊपर चढ़ते हुए जन्नत के प्रथम द्वार पर पहुंच गए। इस द्वार को प्रहरी द्वार कहा जाता है। फरिश्ते जिब्राईल ने इस द्वार के प्रभारी इस्माईल को पुकारा। इस्माइल के अधीन 12 हजार फरिश्ते थे और इन फरिश्तों में से प्रत्येक के पास 12 हजार फरिश्ते थे।

जब जिब्राईल ने मुझे दरवाजे के भीतर प्रवेश कराया, इस्माईल ने मेरे बारे में पूछा कि मैं कौन हूं। जब उसे बताया गया कि मैं मुहम्मद हूं तो उसने पूछा कि क्या मुझे कोई मिशन दिया गया है, या किसी विशेष उद्देश्य के लिए भेजा गया है। जब वह सुनिश्चित हो गया तो उसने मुझे सलाम किया।

जब मैं निचली जन्नत में प्रवेश कर रहा था तो वहां मौजूद फरिश्तों ने मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत किया। पर एक फरिश्ता ऐसा भी था, जिसने न तो मुझसे कुछ कहा और न ही मुझे देखकर उसके चेहरे पर प्रसन्नता और मुस्कुराहट आई । मैंने जिब्राईल से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि वह आज तक किसी को देखकर नहीं मुस्कुराया है। यदि वह अब मुस्कुराया तो तुम पहले इंसान होगे, जिसके लिए वह मुस्कुराएगा। वह मुस्कुराता नहीं है, क्योंकि वह दोजख का मालिक है। मैंने जिब्राईल से कहा, वह अल्लाह के वास्ते इस मुकाम पर है। जिसके बारे में उसने तुम्हें बताया है, ‘यह फरिश्ता सभी फरिश्तों का सरदार अमानतदार है और इसके हुक्म की तामील सभी करते हैं और सबको उस पर भरोसा है। (सूरा 81:21)। और मैंने जिब्राईल से कहा, ‘क्या इस फरिश्ते को हुक्म देकर मुझे दोजख नहीं दिखाओगे ?’ जवाब मिला, ‘जरूर! ऐ मालिक, मुहम्मद को दोजख दिखाओ।’ इसके बाद इस फरिश्ते ने पर्दा हटा दिया। वहां हवा में आग की लपटें उठ रही थीं। मुझे लगा कि वो लपटें सब कुछ राख कर देंगी। मैंने जिब्राईल से कहा कि वह फरिश्ते को इन सब चीजों को अपने स्थान पर वापस भेजने को कहे, जो मालिक ने किया।

मैं उन लपटों को वापस लौटने की तुलना उस साये से कर सकता हूं, जो धीरे-धीरे लुप्त हो रहा हो। इसके बाद लपटें उसी ओर लौट गईं, जिधर से आईं थीं। मालिक ने फिर उस पर पर्दा डाल दिया।

जब मैं जन्नत के पहले दरवाजे के भीतर प्रवेश कर रहा था तो एक व्यक्ति को बैठे देखा, जिसके सामने से इंसानों की रूहें गुजर रही थीं। किसी से वह बहुत अच्छे से बात करता है और कहता, ‘तुम अच्छे इंसान की अच्छी आत्मा हो।’ जबकि दूसरे से गुस्से में कहता, ‘तुम बुरे इंसान थे और तुम्हारी आत्मा भी बुरी है।’

मेरे सवाल के जवाब में जिब्राईल ने बताया कि वह व्यक्ति हम सब का पिता आदम था और वह अपने वंशजों की रूह को अच्छाई और बुराई के तराजू पर तौल रहा था। जब वह किसी मोमिन की रूह देखता तो खुश हो जाता था और जब किसी गैर-मुस्लिम को देखता था तो उसे घृणा होती थी।

तब वहां मुझे ऊंट के थोबड़े जैसे इंसान दिखे। उनके हाथों में आग की तरह जलते हुए पत्थर थे और वे इन पत्थरों को अपने मुंह में डाल रहे थे और ये पत्थर उनके पीछे से निकल रहे थे। मुझे बताया गया कि ये वो लोग हैं, जिन्होंने अनाथों का धन हड़पा था। फिर मुझे फिरऔन (प्राचीन मिस्र के राजवंश) परिवार के लोगों के रास्ते पर आदमी दिखे। उन आदमियों की तोंदें इतनी भयानक थी कि ऐसे भारी तोंद वाले इंसान मैंने नहीं देखे थे। ये आदमी उनके ऊपर चढ़कर जा रहे थे। जब इस राजपरिवार के लोगों को दोजख में डाला गया तो वहां प्यास से पागल ऊंट राज परिवार के लोगों को रौंदते हुए भाग रहे थे। ये लोग वहां से हिल-डुल भी नहीं पा रहे थे। राजपरिवार के लोगों को दोजख में इसलिए डाला गया था, क्योंकि वे सूदखोर थे।”

तब मैंने औरतों को देखा, जिन्हें उनके स्तन से लटकाया गया था। ये वो औरतें थीं, जिन्होंने शौहर के होते हुए व्यभिचार किया और इस व्यभिचार से दोगले बच्चों को जन्म दिया।

इसके बाद मुझे जन्नत के दूसरे दरवाजे पर ले जाया गया। वहां पर दो ममेरे भाई मरियम के बेटे ईसा और जकरिया के बेटे याहिया मिले। जब मुझे जन्नत के तीसरे दरवाजे पर ले जाया गया तो वहां एक आदमी मिला, जिसका चेहरा पूर्णिमा के चांद की तरह था। यह मेरा भाई और याकूब का बेटा यूसुफ था। जन्नत के चौथे दरवाजे पर इद्रीस नाम का व्यक्ति मिला। सूरा 19:58 कहता है और मैंने (अल्लाह ने उन्हें (इंद्रास) ऊंची जगह बुलंद कर पहुंचा दिया है। जन्नत के पांचवें द्वार पर सफेद बाल व लंबी दाढ़ी वाला एक व्यक्ति मिला। मैंने अपनी जिंदगी में इससे खूबसूरत मर्द नहीं देखा था। इस व्यक्ति का अपने लोगों के बीच बहुत प्यार सम्मान था। यह इमरान का बेटा हारून था। छठे जन्नती दरवाजे पर शनूआ ( यमनी कबीले के लोग जो लंबे-चौड़े होते हैं) के जैसी टेढ़ी नाक वाला काला सा आदमी मिला। यह आदमी मेरा भाई और इमरान का बेटा मूसा था। फिर मैं जन्नत के सातवें दरवाजे पर पहुंचा तो देखता हूं कि अदन के बाग में स्थित दिव्य महल के गेट पर सिंहासन पर एक आदमी बैठा है। इस महल में प्रति दिन सात हजार फरिश्ते भीतर जाते थे और वे कयामत के दिन तक वहां से बाहर नहीं निकलेंगे। मैंने इससे पहले अपने जैसा कोई इंसान नहीं देखा था। ये मेरे पिता अब्राहम थे। वह मुझे महल के भीतर ले गए। महल के भीतर मैंने एक कुंवारी युवती को देखा, जिसके होंठ सुर्ख लाल थे। मैंने उससे पूछा कि वह कौन है ? मैंने उसकी ओर देखा तो एक परम आनंद का अहसास हुआ। उसने बताया कि वह जैद बिन हारिस है। रसूल ने जैद को वह अच्छी खबर सुनाई

एक और रिवायत कहती है कि जब जिब्राईल मुहम्मद को जन्नत के दरवाजों तक ले गया और प्रवेश की इजाजत मांगी तो जिब्राईल को पहरेदारों को बताना पड़ा कि वह किसे लेकर आया है। जिब्राईल ने पहरेदारों को बताया कि वह अल्लाह के रसूल मुहम्मद को लेकर आया है, जिसे अल्लाह ने एक विशेष प्रयोजन के लिए धरती पर भेजा है। तब पहरेदार कहते हैं, ‘अल्लाह उसकी (रसूल), उसके भाइयों और दोस्तों की जिंदगी महफूज रखें।’ और पहरेदार मुहम्मद को जन्नत के सातवें दरवाजे तक रास्ता देते गए, जहां वह अल्लाह से मिला। यहीं पर मुहम्मद के अनुयायियों के लिए प्रतिदिन 50 बार नमाज पढ़ने का फर्ज लादा गया। वापसी में मुहम्मद मूसा से मिला। मुहम्मद ने यह वाकया इस तरह सुनाया है:

अल्लाह से मिलकर जन्नत से वापस आते समय मैं मूसा के पास से गुजरा। मुसलमानो! मूसा तो तुम्हारा बहुत अच्छा दोस्त निकला ! मूसा ने मुझसे पूछा कि दिन में कितनी बार इबादत का हुक्म मिला है। मैंने बताया कि 50 तो उसने कहा, ‘इबादत भारी काम है। तुम्हारे लोग कमजोर हैं, ऐसा नहीं कर पाएंगे। अल्लाह के पास फिर जाओ और उनसे निवेदन करो कि तुम्हारे समुदाय के लिए नमाज की संख्या कम कर दें।’ मैंने ऐसा ही किया और अल्लाह ने दस कम कर दिए। मैं फिर मूसा के पास से गुजरा तो उसने वही सवाल किया। उसने फिर मुझे अल्लाह के पास इबादतों की संख्या कम करने की गुजारिश के लिए भेजा और ऐसा तब तक होता रहा, जब तक कि अल्लाह ने दिन में नमाज की संख्या पांच तक नहीं कर दी, साथ ही अल्लाह ने रात के वक्त नमाज न पढ़ने की छूट भी दे दी। हालांकि मूसा ने इसके बाद भी मुझे अल्लाह के पास जाने और नमाज की संख्या कम करने की दरख्वास्त लगाने की सलाह दी, लेकिन मैंने कहा कि इतनी बार जा चुका हूं कि खुद मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही है। अब अल्लाह के पास और कम कराने नहीं जाऊंगा। अल्लाह ने कहा है कि तुममें से जो दिन में पांच बार नमाज पढ़ेगा, वह पचास बार नमाज पढ़ने का फल पाएगा

कुछ मुसलमान कहते हैं कि यह घटना भौतिक जगत में नहीं हुई थी, बल्कि यह एक आध्यात्मिक अनुभव था । हालांकि मुसलमानों के इस दावे की धज्जियां तब उड़ जाती हैं, जब मुहम्मद दावा करता है कि उसने जन्नत की सैर पर जाते समय रास्ते में बनू के कारवां को देखा था, उनके घड़े में से पानी पिया था और कारवां का एक ऊंट बिदक कर भागने लगा था। मुहम्मद को यह अनुभव भौतिक संसार में हुआ था, इसका सबसे बड़ा सबूत कुरान में मिलता है। कुरान कहता है कि मुहम्मद का जन्नत गमन इसलिए हुआ था कि मोमिनों के ईमान को परखा जा सके। जब तक किसी बेतुकी बात पर अध्यात्म का तमगा चिपका रहता है तो लोग उनमें भरोसा करते हैं, लेकिन जब यह अनुभव इसी संसार में होने का दावा किया जाए तो लोगों के मन में संशय होने लगता है।

मुहम्मद कभी-कभी सच उगल देता था
रूसी अस्तित्ववादी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेवस्की का मानना था कि मुहम्मद सच बोल रहा था। उनका मानना है कि मुहम्मद के अनुभव, कम से कम उसके अपने लिए वास्तविक थे। दोस्तोयेवस्की खुद भी टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी की बीमारी से पीड़ित थे। उन्होंने अपने खुद के बारे में बताया है कि जब उन पर दौरा पड़ता था तो उनके लिए स्वर्ग का द्वारा खुल जाता था और सोने की तुरही बजाते हुए फरिश्तों की पंक्ति दिखती थी। फिर स्वर्ग के दो स्वर्णद्वार खुल जाते थे और उसके पीछे सोने की सीढ़ी दिखती थी, जो सीधे ईश्वर के सिंहासन तक जाती थी।

7 मई, 2001 को न्यूजवीक में धर्म और मस्तिष्क शीर्षक के एक लेख में कनाडा के neuropsychology (स्नायु- मनोविज्ञान) अनुसंधानकर्ता ने बतायाः
जब क्रॉस अथवा चांदी में मढ़ी तोरा की छवि मन में उभरती है तो श्रद्धायुक्त धार्मिक भय पैदा होता है। ऐसा मस्तिष्क के दृश्य संबद्ध क्षेत्र की वजह से होता है। जब आंखें कुछ देखती हैं और उस छवि को भावनाओं व स्मृतियों से जोड़ती हैं तो मस्तिष्क का यही हिस्सा उन चित्रों में वह भावना भर देता है। धार्मिक कर्मकांडों अथवा प्रार्थना के समय जो तस्वीर उभरती है, वह भी मस्तिष्क के इसी हिस्से में पैदा होती है: मस्तिष्क के उस हिस्से में इलेक्ट्रिकल उत्तेजना दृष्टि उत्पन्न करती हैं, जो सिर के किनारों पर होता है और इसमें भाषा, संकल्पनात्मक चिंतन एवं विभिन्न चिंतनों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए जिम्मेदार स्नायुओं की सर्किट होती है।

टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी नामक बीमारी में इंसान के दिमाग के इन हिस्सों में अचानक विद्युतीय गतिविधियों का असामान्य प्रस्फुटन होता है और यह अवस्था चरम पर पहुंच जाती है। यद्यपि कि कुछ अध्ययन टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी और धार्मिकता के बीच संबंध होने के तर्क पर संदेह प्रकट करते हैं, लेकिन कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि इस समस्या के दौरान पीड़ित के समक्ष जॉन ऑफ आर्क-टाइप स्पष्ट धार्मिक चित्र व आवाजें होने का अहसास होता है।

हालांकि, टैम्पोरल – लोब इपीलेप्सी दुर्लभ होती है, पर अनुसंधानकर्ताओं को लगता है कि टैम्पोरल लोब ट्रांसिएटस यानी दिमाग में अचानक विद्युतीय गतिविधियों का घनीभूत प्रभाव होने से रहस्यमयी अनुभव हो सकते हैं। इस विचार के परीक्षण के लिए कनाडा के लॉरेंटियन विश्वविद्यालय के माइकल पसिंगर ने एक व्यक्ति के सिर में विद्युत चुम्बकीय तरंगें फेंकने वाला हेलमेट पहनाया। इस हेलमेट से हल्का चुम्बकीय क्षेत्र पैदा होता था, जो एक कम्प्यूटर मॉनिटर से निकलने वाले चुम्बकीय क्षेत्र जितना था। हेलमेट के इस चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र के कारण उस व्यक्ति के मस्तिष्क के खास हिस्से में अचानक विद्युतीय हलचल होने लगी। इस विद्युतीय हलचल के बाद उस व्यक्ति को जो अनुभव हुआ, उसने उसे पारलौकिक अथवा आध्यात्मिक अहसास बताया। पसिंगर ने पाया कि उस व्यक्ति को तन से परे एक दिव्य अहसास हुआ। उन्होंने अनुमान लगाया कि मस्तिष्क के खास हिस्सों में सूक्ष्म विद्युतीय हलचल के कारण मनुष्य को धार्मिक अहसास होता है और यह हलचल चिंता, निजी संकट, आक्सीजन की कमी, रक्त शर्करा का निम्न स्तर पर होना अथवा थकावट के कारण होती है। यही वजह है कि दुख या संकट की घड़ी में लोग ईश्वर या अल्लाह को याद करने लगते हैं।

मुहम्मद के रहस्यमयी अनुभव का मूल
क्या यह संभव है कि दिमाग के एक हिस्से में गुदगुदी होने लगे और इससे रहस्यमयी अनुभव जैसे आसपास किसी के मौजूद होने, किसी अदृश्य ताकत की आवाज आने, प्रकाश देखने अथवा भूत देखने जैसा भ्रम होने लगे ? कनाडा विश्वविद्यालय के स्नायुमनोविज्ञान के विशेषज्ञ माइकल पर्सिंगर ने ऊपर उदाहरण दिया है और इनका मानना है कि यह संभव है। इन्होंने यह प्रदर्शित किया है कि धार्मिक अनुभव होने के रूप में वर्णित उत्तेजना केवल हमारे द्विभागी मस्तिष्क की उत्तेजनापूर्ण गतिविधियों के कारण होती है। सरल शब्दों में कहें तो जब प्रमस्तिष्कीय क्षेत्र में स्थित दाहिने भाग, जहां भावनाएं होती हैं, में उत्तेजना पैदा होती है और इसके बाद भाषा संवेदी बायां भाग काल्पनिक अस्तित्व पैदा करने के लिए सक्रिय होता है। दिमाग में काल्पनिक व्यक्ति, वस्तु या स्थान आदि इस तरह प्रकट होते हैं, मानो वे वास्तव में हों द एक्जासिज्म नामक लो केन होलिंग्स ने पर्सिंगर के काम के बारे में लिखा है: पर्सिंगर का तर्क है कि धार्मिक अनुभव दिमाग के भीतर उत्पन्न होते हैं। ताजा अध्ययन बताते हैं कि हमारे मस्तिष्क के तर्क व विवेक संवेदी भाग में स्थित बायें मस्तिष्क के हिस्से में इस तरह के अनुभव उत्पन्न होते हैं। मस्तिष्क का तर्क व विवेक संवेदी हिस्सा व्यक्तिगत चेतना और बाह्य जगत के बीच एक सीमारेखा बनाने में सहायक होता है। इस हिस्से को यदि बंद कर दिया जाए तो आप खुद को ब्रह्मांड से जुड़ा महसूस करने लगेंगे और इसी को धार्मिक अनुभव का प्राथमिक रूप कहते हैं। दिमाग के दाहिने हिस्से को उत्तेजित कीजिए तो इसमें आत्म संवेदना का भाव जगने लगता है, जो खुद को अलग सत्ता के रूप में मानने को विवश करता है। दिमाग का दाहिना हिस्सा हमारे व्यक्तित्व के भावनात्मक पक्ष को नियंत्रित करता है।

पर्सिंगर ने मोटरसाइकिल हेलमेट में विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र पैदा करने वाली तारों की कुंडली लगाकर एक व्यक्ति के सिर पर पहनाया। इस व्यक्ति को आंखों पर पट्टी बांधकर एक खाली कक्ष में बिठा दिया। वह मजाक में इस कक्ष को जन्नत और दोजख का चैम्बर कहते थे। हेलमेट में जब एकांतर विद्युत प्रवाह दिया गया तो इस प्रयोग में भाग लेने वाले 80 प्रतिशत लोगों ने कक्ष में किसी आत्मा के होने का अहसास किया। कई बार तो इन लोगों ने उन आभासी आत्माओं को पकड़ने या छूने का प्रयास किया। कुछ ने तो बताया कि उन्हें स्वर्ग की सुगंध या नर्क की दुर्गंध सा अहसास हुआ। उन्होंने अजीब आवाजें सुनीं, अंधेरी सुरंग देखी, दैवीय सा प्रतीत हो रहा प्रकाश देखा और एक प्रकार का धार्मिक अनुभव किया। माइकल पर्सिंगर के प्रयोगों पर लिखते हुए एड कानरॉय ने लिखा है:

सामान्य मनुष्य बढ़ी हुई टैम्पोरल लोब एक्टिविटी जैसे रचनात्मकता, समझ, स्मरण क्षमता और सहज ज्ञान प्रक्रिया का प्रदर्शन करते हैं। इनमें से अधिकांश लोग कल्पनाशक्ति के धनी होते हैं अथवा वस्तुनिष्ठ दुनिया का अहसास करने में सक्षम होते हैं, जिससे समाज में उनकी स्वीकार्यता सुदृढ़ होती है। इनमें से कुछ शारीरिक या मानसिक गतिविधियों से जुड़ी समस्याओं का भी सामना करते हैं, जो उनमें हल्का अवसाद उत्पन्न करती हैं। ऐसे लोग अक्सर किसी अदृश्य सत्ता के होने का अहसास करते हैं और जब उन्हें यह अनुभव हो रहा होता है तो उन्हें लगता है कि उनके आसपास कोई है और कुछ अजीबोगरीब दृश्य सामने हैं। यह अहसास सामान्य धार्मिक विश्वासों से इतर अजीब होते हैं।

पर्सिंगर ने पाया कि भूतों का अहसास उसी रूप में हुआ, जिनके नाम या शख्सियत को लोग पहले से जानते थे । धार्मिक व्यक्ति अपने विश्वास के मुताबिक पवित्र शख्सियतों जैसे- इलिजाह, जीसस, कुंवारी मैरी, द स्काई स्पिरिट, मुहम्मद आदि का अहसास करते हैं। कुछ लोग अपने वंश से जुड़े लोगों जैसे बाबा, दादा परदादा आदि का अस्तित्व महसूस करते हैं। मृत्यु के करीब पड़े हुए लोगों के अनुभव (नियर डैथ एक्सपीरिएंसेज-एनडीई) जानने के लिए भी इसी पद्धति का उपयोग किया गया है।

होलिंग्स लिखते हैं, ‘सन् 1933 में मॉन्ट्रियल न्यूरो सर्जन वाइल्डर पेनफील्ड ने पता किया कि जब उन्होंने मस्तिष्क के कुछ स्नायुओं में विद्युत प्रवाह किया तो मरीज अपने ठोस संवेदी अंश में जीवन के पुराने अनुभवों को फिर से महसूस करने लगा। 1976 में प्रकाशित विवादास्पद लेख द ओरिजिन ऑफ कांशसनेस इन द ब्रेकडाउन ऑफ बाईकैमिरल माइंड, प्रिंसटन के मनोवैज्ञानिक जूलियन जेन्स ने तर्क दिया कि धार्मिक अनुभव के रूप में सामान्यतः वर्णित उत्तेजना महज हमारे मस्तिष्क के दाएं और बाएं हिस्से के अस्वाभाविक अंतर्क्रियाशीलता का दुष्परिणाम होती है। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में हमारे पुरखों के पास इस तरह की चीजों की व्याख्या के लिए व्यक्तिगत पहचान की समझ का अभाव था। इसीलिए उन लोगों ने इन अनुभवों को ऊपर की सत्ता यानी ईश्वर की दृष्टि और स्वर से जोड़ दिया था।

जब अध्यात्मिक अहसास जोरों पर होता है तो उस वक्त असल में होता क्या है ? होलिंग्स कहते हैं, ‘जब मस्तिष्क के उस भाग (Amygdala) में हलचल होती है, जो भय के भाव के प्रति संवेदी होती है तो यह भाग निष्क्रिय होने लगता है। इस दौरान किसी चीज को ग्रहण करने की क्षमता रखने वाले मस्तिष्क के पिछले भाग की तंत्रिकाएं मंद पड़ने लगती हैं, जबकि उस समय संवेदी एवं आत्मचेतना जगाने वाला मस्तिष्क का अग्र हिस्सा एवं कनपटी के भाग में स्थित तंत्रिकाएं मस्तिष्क के अन्य भागों से असंबद्ध हो जाती हैं। पेंसिलवैनिया विश्वविद्यालय के डॉ एंड्र न्यूबर्ग ने कुछ तिब्बती लामाओं का ध्यान के दौरान और फ्रांसीसी ननों का प्रार्थना करते समय ब्रेन इमैजिंग कर डाटा एकत्र किया। उन्होंने देखा कि ध्यान के दौरान इन लोगों के मस्तिष्क के ऊपरी पिछले भाग में ऊपर से नीचे तक न्यूरान्स के एक बंडल ने काम करना बंद कर दिया था। मस्तिष्क में यह वही क्षेत्र है, जो सूचनाओं और समय के अहसास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।

पसिंगर ने दिखाया है कि आध्यात्मिक और पारलौकिक अनुभव मस्तिष्क के दोनों हिस्सों के बीच संचार व समन्वय की कमी के कारण होते हैं। कमरे में किसी अदृश्य शक्ति के होने अथवा अपना शरीर छोड़कर विचरण करने जैसा आभास, शरीर के अंगों में विचित्र तरह की ऐंठन और धार्मिक भावनाएं पैदा होना भी दिमाग के भीतर ही उपजता है। पर्सिंगर इस तरह के अनुभवों को टैम्पोरल लोब ट्रांसिएंट अथवा मस्तिष्क के भीतर न्यूरान के प्रवाह में अस्थिरता अथवा असामान्य तेजी के रूप में दिखाते हैं। सवाल यह है कि दिमाग की इन स्थितियों से धार्मिक अवस्था कैसे उत्पन्न होती है ? पसिंगर कहते हैं, ‘आत्म चेतना का भाव खोपड़ी के बाएं भाग में स्थित तंत्रिकाओं से पैदा होता है। मस्तिष्क की सामान्य कार्य प्रणाली में खोपड़ी के दायें भाग में स्थित तंत्र, बाएं हिस्से में स्थित तंत्रिका तंत्र से समन्वय स्थापित करता है। दौरा पड़ने के दौरान जब मस्तिष्क के दोनों भागों में समन्वय नहीं होता है तो बायां हिस्सा एक अलग आत्म चेतना अथवा व्यक्ति या वस्तु की आभासी उपस्थिति का भाव तैयार कर देता है। इसका परिणाम यह होता है कि मरीज को कमरे में किसी फरिश्ते, शैतान, भूत या दूसरे ग्रह के प्राणी या किसी रहस्यमयी साये के होने का आभास होता है अथवा ऐसा लगता है कि वह अपना शरीर छोड़ रहा है या फिर उसे अपने आसपास किसी ईश्वर के होने का आभास होता है। जब Amygdala (मस्तिष्क के भीतर स्थित वह क्षेत्र, जो भावनाओं के प्रति संवेदना जगाती हैं) में कुछ अल्पकालिक असामान्य घटनाएं होती हैं तो भावनात्मक कारक ऐसे अनुभव को बढ़ा देते हैं, जिन्हें यदि आध्यात्मिक थीम अथवा धार्मिक भावनाओं से जोड़कर देखा जाए तो वे किसी शक्तिशाली धार्मिक सत्ता का आभास कराने लगती हैं।

मस्तिष्क में हलचल से अदृश्य साये का आभास
स्विस वैज्ञानिकों ने पाया है कि मस्तिष्क में विद्युतीय हलचल होने से किसी ऐसी छाया के आसपास होने का भ्रम हो सकता है, जो व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों की नकल करते हुए जान पड़ती है। पत्रिका नेचर में छपी एक संक्षिप्त रिपोर्ट और ऑनलाइन विज्ञान पत्रिका पीएचवायओआरजी डॉट कॉम के ब्रेन स्टीमुलेशन क्रिएट्स शैडो पर्सन नामक संक्षिप्त लेख में कहा गया है: लुसाने के फैडरल पॉलीटेक्निक स्कूल के औलफ ब्लैंक व उनके सहयोगियों ने बताया कि सीजोफ्रीनिया के लक्षण प्रकट करने वाली मस्तिष्क की प्रक्रिया पर उनकी खोज प्रकाश डाल सकती है। सीजोफ्रीनिया नामक बीमारी में ऐसा भ्रम होता है कि व्यक्ति के कार्यों को किसी और द्वारा किया जा रहा है। डॉक्टर एक ऐसी महिला की जांच कर रहे थे, जिसे लगता था कि उसके पीछे कोई व्यक्ति खड़ा रहता है। इस महिला का मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कोई इतिहास नहीं था। जांच में डाक्टरों ने पाया कि उसके मस्तिष्क के बांये भाग में संयोजन क्षेत्र में विशेष तरह की हलचल होने के कारण उसे यह भ्रम हो रहा था।

इस महिला रोगी ने डॉक्टरों को बताया कि वह अज्ञात व्यक्ति वैसे ही शारीरिक गतिविधियां करता है, जैसा कि वे स्वयं । अर्थात वह अज्ञात साया उस महिला की गतिविधियों की नकल करता है। हालांकि महिला यह नहीं समझ पाती थी कि यह उसका भ्रम है। जांच के दौरान महिला से कहा गया कि वो आगे झुके और अपने घुटनों को सटाए। महिला ने ऐसा किया तो उसे लगा कि वह साया उसे पकड़ रहा है और महिला इससे परेशानी का अनुभव कर रही थी। न्यूरोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह निष्कर्ष उन्माद, अत्याचार और किसी बाह्य अदृश्य शक्ति द्वारा नियंत्रण करने का अहसास जैसा मनोवैज्ञानिक प्रभावों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। यह खोज नेचर पत्रिका के इस सप्ताह के अंक के ब्रीफ कम्युनिकेशन में छपी है

इन निष्कर्षो से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मुहम्मद को कथित दैवीय अनुभव के समय क्या सुनाई या दिखाई देता था अथवा क्या महसूस होता था ? मुहम्मद उस संस्कृति से आया था, जो जिन्न, फरिश्ते, भूतों और शैतानों में विश्वास रखती थी। मुहम्मद को जब विभ्रम होता था तो वह इन्हीं सब को देखता था। ईश्वर एक है या कई, यह उस दौर में चर्चा का विषय था। यहूदी, ईसाई और हनीफी मानते थे कि ईश्वर एक है, जबकि मुहम्मद का अपना कुनबा मानता था कि ईश्वर के कई रूप हो सकते हैं। मुहम्मद अपने आसपास के लोगों के पारंपरिक धार्मिक विश्वास को मानने के बजाय विदेशज अद्वैतवाद के पक्ष में रहा। यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि खदीजा मुहम्मद के इंद्रजाल वाले अनुभवों की व्याख्या करती थी और मुहम्मद उससे बहुत प्रभावित रहता था। खदीजा अद्वैतवादी थी। मुहम्मद को अजीबोगरीब अनुभव होते थे, वह उसे वास्तविक मानता था, जबकि वास्तव में ये सब उसका दिमागी फितूर होता था। जब मुहम्मद खदीजा को अपनी कहानियां सुनाता था तो उसे लगता था कि उसके शौहर पर या तो शैतान का साया आ गया है, या फिर उसके पास फरिश्ते आते हैं। चूंकि वह यह स्वीकार नहीं कर पा रही थी कि मुहम्मद पागल हो गया है, इसलिए जब मुहम्मद ने उससे कहा कि उसे कुछ हो जाएगा तो उसने जवाब दिया, ‘तुम्हें कभी कुछ नहीं होगा… अल्लाह तुम्हारा सिर कभी नहीं झुकने देगा।

वो मुहम्मद के मानसिक रूप से बीमार होने की बात पचा नहीं पा रही थी, इसलिए उसके पास सिर्फ एक विकल्प था कि वो मुहम्मद के पागलपन को दैवीय कृपा माने। इसलिए उसने निष्कर्ष निकाला कि मुहम्मद को पैगम्बर के रूप में चुना गया है। यदि खदीजा मुहम्मद के पागलपन को बिना शर्त और अंधी होकर समर्थन नहीं करती तो वह अवश्य समझ पाता कि वह पागल हो रहा है। ऐसा होता तो मुहम्मद अपनी उन्मादी हालत की हकीकत जान पाता, जैसा कि अधिकांश विक्षिप्त मरीज बाद में कर पाते हैं।

इल्हाम का बोझ न बर्दाश्त कर पाने के कारण ऊंट का घुटनों के बल बैठना
मुसलमान अक्सर मुहम्मद के झूठे चमत्कारों को अतिरंजित कर बताते हैं और उस पर भरोसा करते हैं। ऐसा करना किसी भी संप्रदाय के अनुयायी के लिए सामान्य सी बात है, क्योंकि ये अनुयायी सभी चमत्कारों को अपने गुरु से जोड़ते हैं। एक हदीस दावा करती है कि एक दिन जब मुहम्मद एक ऊंट पर बैठा तो उसी समय उसे अल्लाह का पैगाम मिलने लगा। यह इल्हाम इतना भारी था कि ऊंट उसके बोझ को बर्दाश्त न कर सका और जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया।

जब कथित रूप से इल्हाम हो रहा था तो उस वक्त मुहम्मद जो अनुभव कर रहा था उस किस्से और जानवर के बैठ जाने की घटना के बीच कुछ तो संबंध है। यह संकेत करता है कि मुहम्मद मिर्गी की बीमारी से पीड़ित था । टैक्सास ए एंड एम विश्वविद्यालय के वैटनरी औषधि कॉलेज के पशु व्यवहार के विशेषज्ञ बोनी बीवर कहते हैं, ‘कुत्ते और बिल्लियां ऐसे जानवर हैं, जो मनुष्य को दौरा पड़ने से पहले ही सूचना देने में सक्षम होते हैं। जानवरों द्वारा अपने मालिक पर पड़ने वाले दौरे को भांप लेना सामान्य बात है। कुत्तों को तो बाकायदा प्रशिक्षित किया जा सकता है कि वह अपने मालिक को दौरा पड़ने से पूर्व ही चेतावनी दे सके।

मनुष्यों पर पड़ने वाले दौरे का पूर्वानुमान लगाने की क्षमता केवल कुत्ते या बिल्लियों में ही नहीं होती है। सामान्यतः सभी जानवर ऐसी चीजों के पूर्वानुमान के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, पर इन जानवरों के संकेत समझ पाने में मनुष्य अक्षम होते हैं। जानवर भूकंप आने के कई घंटे पहले ही इसका पूर्वानुमान लगा सकते हैं। बहुत से जानवर, खासकर घोड़े और पालतू जानवर तूफान आने के पहले ही इसे जान लेते हैं।

जनवरी, 2005 में मैयन मोट्ट (Mayann Mott) ने नेशनल जियोग्राफिक न्यूज में एक लेख लिखा था, जिसमें कहा था:

श्रीलंका और भारत के तटीय क्षेत्रों में सुनामी आने से दस दिन पहले आवारा और पालतू जानवरों को इस खतरे का अहसास हो गया था और वे सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे थे। चश्मदीदों के मुताबिक हाथी चिंघाड़ रहे थे और किसी ऊंचाई वाले स्थान की ओर भाग रहे थे। कुत्ते घर से बाहर जाने में प्रतिरोध कर रहे थे। बतख अपने अंडे सेने के उन स्थानों को छोड़कर जा रहे थे, जो नीचे थे। चिड़ियाघरों के जानवर अपनी खोहों में चले गए थे और बाहर नहीं निकल रहे थे। सदियों से ऐसा माना जाता है कि जानवरों व पक्षियों के पास छठी इंद्रिय होती है, जो उन्हें पृथ्वी के भीतर हो रही किसी असामान्य गतिविधि या प्रकृति की गतिविधि की जानकारी पहले ही दे देती है

महत्वपूर्ण बात यह है कि जानवर दृश्य या अदृश्य चीजों का बोध कर लेते हैं। खासकर वे अपने मालिक पर पड़ने वाले दौरे को समय से पहले भांप लेते हैं, जबकि मानव के पास यह क्षमता नहीं होती है। यह कोई असामान्य बात नहीं है कि कोई जानवर जबकि उसके मालिक पर दौरा पड़ने वाला हो। बेचैनी का अहसास करे और बिदकने लगे।

हम जानते हैं कि जिस इल्हाम के खुद पर नाजिल होने का दावा मुहम्मद करता था, उसका अहसास न तो मुहम्मद की बीवियां कर पाती थीं और न ही उसके साथी। ऐसे ही एक बार जब मुहम्मद पर पागलपन का दौरा पड़ा तो उसने अपनी बीबी आयशा से कहा, ‘ये जिब्राईल है। यह तुम्हें सलाम कर रहा है और दुआएं दे रहा है। आयशा बोली, ‘मेरी ओर से भी उसे सलाम और शुभकामनाएं।’ फिर रसूल की ओर मुखातिब होकर आयशा ने कहा, ‘तुम जो देख रहे हो, मुझे तो वह नहीं दिख रहा। इसलिए यदि एक ऊंट यह महसूस कर सका कि मुहम्मद को क्या हो रहा है, तो यह भी एक सुराग है कि मुहम्मद को उस वक्त दौरा पड़ा था।

फिल के. डिक का केस
मिर्गी के कई रोगियों पर किया गया अध्ययन मुहम्मद की हालत को समझने में सहायक होगा। इन रोगियों और मुहम्मद के व्यवहार में कई समानताएं मिलती हैं। अमरीकी विज्ञान कथा लेखक फिलिप किंड्रेड डिक (19281982) ने चार्ल्स प्लैट के प्रति अपने अजीबोगरीब भ्रम के बारे में बताते हुए कहा है, ‘मुझे महसूस होता था कि मेरे मन-मस्तिष्क पर अतार्किक बातें हावी हो जाती थीं। जीवन भर मुझे ऐसा लगता था जैसे कि मैं पागल हो गया हूं और अचानक कुछ देर बाद मैं खुद को दिमागी रूप से बिलकुल स्वस्थ पाता था।

डिक के कार्य इस बुनियादी धारणा से प्रारंभ होते हैं कि कोई अकेली वस्तुनिष्ठ वास्तविकता नहीं हो सकती। ‘सब कुछ बोध आधारित होता है। चार्ल्स प्लैट डिक के उपन्यासों की व्याख्या करते हैं। नायक को ऐसा लगता है कि वह किसी और के सपने में जी रहा है अथवा वह नशे की दुनिया में जा सकता है, जहां उसे वास्तविक संसार से बेहतर महसूस होता है या फिर ऐसा व्यक्ति पूरी तरह किसी दूसरे लोक में पहुंच जाता है।

डिक भी मुहम्मद की तरह ही पागल, भावनात्मक रूप से बचकाना और नासस्टिक था। उसके मन में भी आत्मघाती विचार आते थे और अपने अभिभावकों के प्रति रोष था। वह कल्पना करता था कि के. जी. बी. या एफ.बी.आई. उसके खिलाफ षडयंत्र रच रहे हैं और ये एजेंसियां उसके लिए जाल बिछा रही हैं। हम इसी तरह का पागलपन मुहम्मद की बातों में देख सकते हैं। मुहम्मद भी लगातार काफिरों के बारे में बात करता था और कहता था कि काफिर उसके खिलाफ षडयंत्र रच रहे हैं, उसके मजहब का विरोध कर रहे हैं और उसके अनुयायियों सहित उस पर अत्याचार कर रहे हैं। डिक का अंतिम आत्मकथात्मक उपन्यास वलीज एक बेवकूफ द्वारा ईश्वर की खोज जैसा है। इस उपन्यास में उस ईश्वर की तलाश की जा रही है, जो अंतरिक्ष की कक्षा में से भेजा गया वायरस, मजाक और त्रिआयामी काल्पनिक चित्र है। इस उपन्यास की प्रस्तावना धर्मशास्त्र संबंधी कौतुहल है, जिसमें वह गुलाबी लेजर प्रकाश पुंज में एक संदेश प्राप्त करता है और स्वयं को ईश्वर से सीधा जुड़ा पाता है। इस उपन्यास में डिक दैवीय शक्ति के साथ अपनी स्वघोषित भेंट की छानबीन करता है। वलीज वास्ट एक्टिव लिविंग इंटेलीजेंस सिस्टम का संक्षिप्त शाब्दिक रूप है। वह एक सिद्धांत देता है कि वलीज वास्तविकता का जनक और अलौकिक संचार दोनों है।

डिवाइन इन्वेजन: एक लाइफ ऑफ फिलिप के. डिक लेख में लारेंस सूतिन (Lawrence Sutin) डिक के उन रहस्यमयी अनुभवों के बारे में बताते हैं, जो मुहम्मद के रहस्यमयी अनुभवों से काफी मेल खाते हैं।

सोमवार की रात उसने मुझे बुलाया और कहा कि पिछली रात वो मारिजुआना पी रहा था, जो एक मिलने वाला मेरे पास छोड़ गया था। जब वह मारिजुआना पी रहा था तो उसे महसूस हुआ कि वह किसी ऐसी अवस्था में जा रहा है, जो उसका जाना-पहचाना सा है और उसे ऐसी चीजें दिख रहीं हैं, जो सामान्यतः नशे की हालत में नहीं दिखती हैं। फिर उसने कहा, ‘मैं ईश्वर को देखना चाहता हूं, मुझे अपना दर्शन कराओ।’ तभी अचानक, उसने मुझे बताया कि वह भयानक रूप से डर गया। उसने ऑर्क ऑफ द कोवेनैंट को देखा और एक आवाज को कहते सुना, ‘तुम मेरे पास तार्किक साक्ष्य या विश्वास के माध्यम से नहीं आ पाते, इसलिए तुम्हें इस तरीके से विश्वास दिला रहा हूं।’ ऑर्क का पर्दा फिर से गिर गया और उसने प्रत्यक्ष रूप से शून्य में उभरती एक त्रिकोणीय आकृति देखी, जिसमें एक आंख थी। वह आंख उसे घूर रही थी। फिल ने कहा कि वह रविवार शाम के 9 बजे से लेकर सोमवार शाम पांच बजे तक ऐसी दिव्य चीजें देखते हुए मारे डर के जमीन पर कुहनियों और घुटनों के बल पड़ा हुआ था। उसने कहा कि उसे लगा वह मर जाएगा और यदि वह टेलीफोन तक पहुंचने की हालत में होता तो पैरामेडिकल को फोन जरूर करता। अदृश्य आवाज ने उससे कहा, ‘तुम अब तक हर अहसास को वहम मानकर झुठलाते रहे हो। मैं तुम्हें सच दिखलाता हूं, पर यह देखने के बाद तुम इसे कभी न तो भूल सकोगे और न ही इससे सामंजस्य बिठा पाओगे या गलत ढंग से पेश कर पाओगे।

डिक की असामयिक मौत 54 वर्ष की अवस्था में हुई। इस उम्र में ही उसने काफी कुछ लिखा । उसकी आत्मकथा लिखने वाले सूतिन उसके लेखन के एक हिस्से का उद्धरण देते हैं, जहां उसने अपने रहस्यमयी अनुभवों का वर्णन किया है:

अनंत शून्य के रूप में ईश्वर मेरे सामने प्रकट हुआ। यह शून्य कोई गहरी अंधेरी सुरंग नहीं था, बल्कि यह नीले आसमान और धवल बादलों से ढंके हुए स्वर्ग का मेहराब था। वह कोई विदेशी ईश्वर नहीं था, बल्कि वह तो मेरे पुरखों का ईश्वर था। वह प्रेम बरसाने वाला दयालु और मोहक व्यक्तित्व वाला ईश्वर था। उसने कहा, ‘जीवन में जो कष्ट तुम भोग रहे हो, वह उस आनंद की तुलना में कुछ भी नहीं है। परमानंद तुम्हारी प्रतीक्षा में है। क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें आनंद का पुरस्कार देने के बजाय दुख भोगने के लिए छोड़कर तुमसे प्रतिशोध लूंगा ? उसने मुझे उस परमानंद का भान कराया, जो मुझे मिलने वाला था। यह परमानंद असीम और सुंदर था। उसने कहा, ‘मैं अनंत हूं। मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि मैं कहां रहता हूं। जहां अनंत सत्ता है, वहीं मेरा निवास है। जो मुझसे छूट जाता है, वह बीमार माना जाता है। जब मैं होता हूं तो उसकी उड़ान का पंख मैं होता हूं। मैं ही संदेह करने वाला और संदेह दोनों हूं।

टीएलई के अन्य मामले
23 अक्टूबर, 2001 को पीबीएस टेलीविजन ने टीएलई पर एक वृत्तचित्र का प्रसारण किया। इसमें टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी से ग्रस्त व्यक्ति जॉन शैरन का साक्षात्कार भी था। इस साक्षात्कार में जॉन के पिता और कैलीफोर्नियासैन डियागो विश्वविद्यालय के न्यूरोलॉजिस्ट वीएस रामचंद्रन भी थे। जॉन शैरन के केस को पढ़कर इसकी तुलना मुहम्मद के बारे में उपलब्ध जानकारियों से करना रुचिकर होगा। इससे पैगम्बर मुहम्मद की मानसिक दशा और दिमागी अस्वस्थता पर प्रकाश डाला जा सकता है।

जॉन शैरन: जब दौरा पड़ता है तो मेरा शरीर, मेरी आत्मा और मेरी चेतना तीनों को प्रभावित करता है। जब मैं इस दौर से गुजरता हूं तो ऐसा लगता है कि मेरे पूरे शरीर में झुनझुनी हो रही है और मैं कह उठता हूं, ओह…., अब बस।

व्याख्याकारः जॉन पर दौरे पड़ने के दौरान निश्चित ही उसके मस्तिष्क के भीतर विद्युतीय प्रवाह तीव्र हो जाता है और इससे अचानक न्यूरॉन का समूह उस भाग में बढ़ने लगता है। इससे मस्तिष्क के अन्य भाग से उस भाग का संतुलन बिगड़ने लगता है। हाल ही जॉन पर भयावह दौरा पड़ा। वह अपनी महिला मित्र के साथ थार में गया था और दोनों ने खूब शराब पी। इसका नतीजा यह हुआ कि जॉन पर अचानक रह-रहकर तेज दौरा पड़ने लगा, जो कभीकभी पांच-पांच मिनट तक रह जाता था। इससे उसका शरीर ऐंठने लगा और वह बेहोश हो गया। आखिर में किसी तरह जॉन अपने पिता को फोन कर सका और वो आकर उसे घर ले गए।

जॉन शैरान: घर लौटते समय मैं और मेरे पिता के बीच कुछ दार्शनिक चर्चा होने लगी। मैंने जब बोलना शुरू किया तो बोलता ही रहा। ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं अति उत्तेजना में था।

जॉन शैरन सीनियर : यह असल में ऐसा था, जैसे शरीर में भूकंप आ गया हो और जैसे भूकंप के बाद कई झटके आते हैं, वैसे ही रह-रहकर शरीर में झटके आ रहे थे। जिस प्रकार भूकंप आने के बाद सबकुछ अस्तव्यस्त हो जाता है और पुननिर्माण की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही शरीर में झटके लगने के बाद शिथिलता आने लगती है। मुझे मुख्यतः तब जूझना पड़ता है जब झटके आने के बाद और खासकर आखिरी झटका आने के बाद उसकी (जॉन की) हालत बुरी हो जाती है। यह कुछ ऐसा ही होता है जैसे कि सल्वाडोर डाली की किसी पेंटिंग को देखते हुए उस चित्र में खोकर उनके पात्रों को जीने लगना। अचानक चित्र की चीजें, व्यक्ति या दृश्य यथार्थ लगने लगती हैं। झटका आने के बाद उसकी हालत पर दृष्टि पड़ती है तब पता चलता है कि वास्तव में उस पर दौरा पड़ने का क्या प्रभाव पड़ा। उसके बाद उसका मस्तिष्क, मन, याददाश्त, सोचने की क्षमता और बाकी सबकुछ प्रभावित होता है।

व्याख्याकारः जब जॉन पर से दौरे का प्रभाव उतरता तो वह बिलकुल निढाल हो जाता था, लेकिन फिर भी उसे लगता था कि वह सर्वशक्तिमान है।

जॉन शैरन: मैं सड़क पर चीखता हुआ दौड़ रहा था कि मैं ईश्वर हूं। तभी यह आदमी बाहर निकला और मैंने उसको व उसकी पत्नी को कमर से कामुक धक्का मारा। मेरे भीतर से आवाज आ रही थी, ‘तुम कमबख्त इस बात की शर्त लगाना चाहते हो कि मैं ईश्वर नहीं हूं।’

जॉन शैरन सीनियर और मैंने सीधा कहा, ‘अरे ओ गधे, वापस आ ! तू क्या कर रहा है ? तू पड़ोसियों को परेशान कर रहा है। वो पुलिस बुला लेंगे। क्या है ये सब ?”

जॉन शैरन: मैंने उसकी ओर शांत और संयमित भाव से देखा और माफी मांगी। कुछ इस तरह बोला, ‘न, न, ईश्वर के लिए कोई पुलिस नहीं बुलाएगा। वैसे मैंने ये आखिरी वाक्य मुंह से निकाला नहीं था, बस मैं अपने आप से बात करते हुए मन ही मन कह रहा था कि ‘ईश्वर के लिए कोई पुलिस बुलाने नहीं जा रहा।’

व्याख्याकारः जॉन कभी भी धार्मिक नहीं रहा। फिर जब उस पर दौरा पड़ता तो उसके भीतर जबरदस्त आध्यात्मिक भाव जाग जाता था।

कैलीफोर्निया के सैन डियागो विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं मस्तिष्क व अनूभूति केंद्र के निदेशक विलयनूर एस. रामचंद्रन (Vilayanur S. Ramachandran) ने टैम्पोरल लोब इपीलैप्सीपर बहुत काम किया है।

वीएस रामचंद्रन: यह लंबे समय से ज्ञात है कि दिमाग में दौरा पड़ने पर कुछ मरीज गहन धार्मिक आभामंडल और ईश्वर के अपने पास आने की अनूभूति करते हैं। कभी-कभी यह मरीज का व्यक्तिगत ईश्वर होता है और कभीकभी यह ब्रह्मांड के साथ एकाकार होने का बिखरा सा अहसास होता है। इस दौरान जो भी होता है, वह बड़ा सार्थक लगता है। मरीज कहता है, ‘डाक्टर, आखिरकार मैं समझ पा रहा हूं कि यह सब क्या है। मैं वास्तव में ईश्वर को समझ पा रहा हूं। मुझे पता चल चुका है कि ब्रह्मांड में मेरा क्या स्थान है। टैम्पोरल लोब सीजर के दौरान मरीजों में यह क्यों होता है और अक्सर ही क्यों होता है ?’

जॉन शैरन: हे भगवान! तुम्हें पता है ? मेरा दिमाग बिलकुल ठीक है। मैं जानता हूं कि मैं बाहर जाकर अनुयायी बना सकता हूं। जो मेरा अनुसरण करने लगेंगे, वे लोग अक्ल के अंधे और बेवकूफ नहीं होंगे। वे जानते हैं कि मैं पैगम्बरों की नई पीढ़ी में से हूं और मैं उन पैगम्बरों में से हूं, जिनके चारों ओर लोग जमीन पर बैठकर संदेश सुनते थे। क्या यह वही संदेश, मानव के लिए ईश्वर की ओर भेजा गया कालजयी उपहार नहीं है ?

वीएस रामचंद्रनः ऐसा मुमकिन है, है न? हां?

जॉन शैरन: मैं कभी भी धार्मिक नहीं रहा हूं। लोग कहते हैं, ‘नहीं, तुम भविष्यदृष्टा नहीं हो सकते।’ पर प्रभु ने तुम्हें वह उपहार अर्थात भविष्य दृष्टा होने का उपहार दिया है, लेकिन तुम्हें इसकी कीमत चुकानी होगी, चारों ओर से निंदा झेलकर।

वीएस रामचंद्रनः अब, दौरा पड़ने के दौरान इन मरीजों में इतना प्रबल धार्मिक अनुभव कहां से होता है ? और क्यों वे दौरा पड़ने के दौरान धर्मशास्त्र संबंधी और धार्मिक मामलों को लेकर इतने बेचैन हो जाते हैं? एक संभावना यह है कि मस्तिष्क में दौरा पड़ने पर मनुष्य के मन-मस्तिष्क में विचित्र व असामान्य भावनाएं उत्पन्न होती हैं। इन विचित्र भावनाओं के वशीभूत मरीज को लगता है कि वह किसी दूसरे लोक से इस धरती पर आया है। अथवा उसे लगता है कि ईश्वर उसके पास आ रहा है। हो सकता है कि दिमाग में चल रही इस अजीबोगरीब हड़बड़ी को भांपने का मरीज के पास इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता न हो। दूसरी संभावना यह है कि इसका संबंध मस्तिष्क के कार्य करने के उस तरीके से हो सकता है, जो दौरा पड़ने पर खुद को दुनिया से भावनात्मक रूप से जोड़े रखने में सहायक होता हो। जब हम आसपास घूमते हैं और दुनिया के साथ तालमेल बिठाते हैं तो हमें यह निश्चित करने की आवश्यकता होती है कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं, भावनात्मक रूप से क्या विशेष और प्रासंगिक और क्या तुच्छ है।

ये सब घटित कैसे होता है ? हमें लगता है कि मस्तिष्क के दायें और बाएं भाग और ऊपरी मध्य भाग में स्थित संवेदी क्षेत्रों में संपर्क जटिल होता है। यह संपर्क जितना मजबूत होता है, भावनात्मक रूप से यह पहचानने में आसानी होती है कि कौन सी चीज कितनी महत्वपूर्ण है। इसलिए ऐसी हालत में आप को भावना प्रधान परिदृश्य दिखने लगते हैं, जिसमें पहाड़ियां होती हैं, घाटियां होती हैं, तद्नुसार आप निर्धारित करने लगते हैं कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या महत्वपूर्ण नहीं है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा अलग-अलग तरह के भावना प्रधान परिदृश्य की कल्पना करता है। अब जरा सोचिए, उस क्षण मस्तिष्क के भागों में क्या होता है, जब दौरा पड़ता है। होता यह होगा कि इस दौरान दिमाग का प्रत्येक भाग असामान्य तरीके से एक दूसरे से संपर्क करने लगता होगा। यह ठीक वैसा ही समझा जा सकता है, जैसे कि किसी छोटी नदी के जल का प्रवाह व स्तर अचानक इतना बढ़ जाए कि वह किनारे की चट्टानों के ऊपर से बहने लगे। जब लगातार बारिश होती है तो ताल तलैया भर जाते हैं और फिर उसका पानी आसपास के मार्गों पर बहते हुए अपने लिए खड्डे बनाने लगता है। ये खड्डे जैसे-जैसे गहरे होते जाते हैं, कृत्रिम रूप से एक तरह का भावनात्मक प्रभाव पैदा करने लगते हैं, हालांकि ये कोई स्थाई नहीं होते। इसीलिए ऐसा अनुभव करने वाला शेर, चीता और अपनी जननी आदि को ही महत्वपूर्ण नहीं मानता, बल्कि वह सभी चीजों बड़ी गहराई से महत्वपूर्ण मानने लगता है। उदाहरण के लिए वह रेत के कण, छोटी-मोटी वस्तुओं, समुद्र के आसपास उगने वाली घास आदि को बहुत गंभीरता से लेने लगता है। इस तरह की प्रवृत्ति तीव्र होने पर मनुष्य अपने आसपास की सभी वस्तुओं को ब्रह्मांडीय महत्व से जोड़ने लगता है और यह एक तरह रहस्यमयी अथवा धार्मिक अनुभव का भ्रम पैदा करता है।

मस्तिष्क के भागों में ऐसा कोई विशिष्ट स्थान नहीं है, जो ईश्वर की संकल्पना से जुड़ा हो। पर यह हो सकता है कि मस्तिष्क के कुछ भाग में कुछ ऐसी गतिविधियां होती हों, जो धार्मिक विश्वास के प्रति अनुकूलता पैदा करती हों। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है, पर ऐसा हो सकता है। सोचने की बात है कि धर्म में विश्वास के लिए मस्तिष्क में तंत्रिकाओं की मशीनरी क्यों होगी ? पर यह तो सच है कि धर्म में विश्वास बहुत व्यापक है। प्रत्येक कबीला, प्रत्येक समाज के पूजापाठ की कुछ निश्चित पद्धतियां हैं। हो सकता है कि इसके पीछे का कारण समाज को स्थिरता देना हो अथवा यह भी हो सकता है कि किसी पारलौकिक सत्ता में विश्वास करना चित्त को स्थिर बनाने का आसान तरीका हो ।

और यह एक कारण हो सकता है कि मन में धार्मिक भावनाएं क्यों उमड़ती हैं। इतिहास करिश्माई धार्मिक शख्सियतों से भरा पड़ा है। मनौवैज्ञानिक विलियम जेम्स ( 1842 1910) का मानना है कि पैगम्बर पॉल ने दमासकस जाते हुए रास्ते में जो देखा, वह एक प्रकार का दौरा पड़ना रहा होगा। जब उन्हें यह अनुभव हो रहा होगा तो उनके दिमाग की तंत्रिकाओं में उत्तेजना तेज हो गई होगी, जिससे एक प्रकार का मिर्गी का दौरा पड़ा होगा और इसके बाद तंत्रिकाएं शिथिल पड़ गई होंगी।

पॉल ने इस यात्रा के दौरान एक प्रकाश पुंज देखा और एक आवाज सुनी, जो उनसे कह रहा था, ‘सॉल, सॉल, तुम मेरे पर जुल्म क्यों कर रहे हो ? इसके बाद पॉल लगभग अंधे हो गए और परिणामस्वरूप वे धर्मांतरित भी हो गए। पॉल ने जो देखा, उसे निम्न शब्दों में बयान किया है:

चूंकि मुझे इल्हाम हुआ, और मैं इस पर दंभी न हो जाऊं, इसके लिए ईश्वर ने मेरी देह में शैतान का एक कांटा लगा दिया, ताकि वह मुझे सताता रहे। मैंने ईश्वर से तीन बार अनुनय-विनय किया कि इस कांटे को निकाल दे। लेकिन ईश्वर ने कहा, ‘मेरी कृपा तुम्हारे लिए पर्याप्त है, क्योंकि मेरी शक्ति तुम्हें कमजोर स्थितियों में भी पूर्ण बनाती है।

ऐसा ही एक प्रसिद्ध मामला सोलहवीं सदी के एविला (Avila) की संत टेरेसा (1515-1582) का है। वे भी विचित्र अनुभव बताती थीं। वो बताती थीं कि उनके सिर में भयानक दर्द शुरू होता था और बेहोशी जैसी स्थिति आ जाती थी, पर इसके बाद बेहद शांति, स्थिरता और आत्म आनंद का अहसास करती थीं, जो उन्हें ईश्वर की महानता का बोध कराता था ।” उनकी जीवनी लिखने वाले अनुमान लगाते हैं कि उन्हें इपीलेप्टिक दौरा पड़ता रहा होगा ।”

लाप्लैंट कहते हैं कि विंसेंट वैन गॉफ़, गुस्ताव फ्लावर्ट, लुईस कैरोल, मर्सेल प्राउस्ट, टैनीसन, फ्योडोर दोस्तोवेस्की आदि चित्रकार व लेखक भी टीएलई के शिकार थे। टीएलई के मरीज अक्सर व्यक्तित्व परिवर्तन की दशा से गुजरते हैं, जो उनमें पारंपरिक रूप से बाध्यकारी लेखन या चित्रकारी अथवा अतिधार्मिकता की ओर ले जाता है। लाप्लैंट के मुताबिक, मुहम्मद भी टीएलई के रोग से ग्रस्त था। मार्मनवाद के प्रणेता जोसफ स्मिथ और सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट मूवमेंट की संस्थापक एलेन व्हाइट इसके हालिया उदाहरण हैं। एलेन व्हाइट जब 9 साल की थीं तो उन्हें सिर में गहरी चोट लगी थी और इसके बाद उनका व्यक्तित्व पूरी तरह बदल गया था। उन्हें प्रभावशाली धार्मिक अहसास होने लगा था। यहूदी समुदाय के नास्तिक मनोवैज्ञानिक हेलन सुकमैन जिसने दावा किया कि ए कोर्स इन मिरैकल्स नामक पाठ के रूप में दिव्य संदेश उसे स्वयं ईसामसीह ने दिया है, वह भी संभवतः टीएलई की समस्या से ग्रस्त था ।

सुकमैन ने अपने जीवन के आखिरी दो साल भयानक पागलपन और अवसादग्रस्त अवस्था में बिताए थे। बाबी या ब्रहाई (Babi) धर्म के संस्थापक सैयद अली मुहम्मद को भी संभवतः दौरे पड़ते थे। बाबी या ब्रहाई की फारसी ari नामक पुस्तक ( यह अंग्रेजी में अनूदित है और ऑनलाइन उपलब्ध है) पागलपन से भरी एक उत्कृष्ट रचना है, जिसमें कथाशिल्प और लालित्य भी है, हालांकि सामग्री बहुत कम है।

इपीलैप्सी से पीड़ित अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति
हाइडी हांसेन और लीफ बोर्क हंसेन ने सोरेन किर्केगार्ड के बारे में अपने जर्नल में लिखा है कि वो टीएलई नामक समस्या से पीड़ित था, पर यह बात उसने पूरे जीवन भर छिपा कर रखी। इन्होंने उसी का उद्धरण दिया: ‘सभी दुखों में वह सर्वाधिक कष्टदायी होता है जो किसी को दया का पात्र बना दे और जब व्यक्ति इस स्थिति में आता है तो चूंकि लोग सामान्यतः ऐसे व्यक्ति को मूर्ख और तुच्छ मानने लगते हैं, इसलिए वह ईश्वर से बगावत का रास्ता अपनाने की ओर बढ़ने लगता है। यद्यपि ठीक से देखें तो पाएंगे कि संसार के अधिकांश महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक व्यक्तियों में कुछ इस तरह का लक्षण ढंके छिपे रूप में होता है।

ये दोनों डेनिश दार्शनिक बिलकुल ठीक कह रहे थे। टीएलई से पीड़ित व्यक्ति मूर्ख होने के बजाय विशिष्ट प्रतिभा के धनी होते हैं। टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी को रचनात्मकता के रोग के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इतिहास में प्रसिद्ध व प्रतिभाशाली व्यक्ति के रूप में पहचान रखने वालों में से अनेक टीएलई के रोग से पीड़ित थे और यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इस रोग के कारण ही उनमें रचनात्मकता का गुण आया था। प्रति एक हजार मनुष्यों में से 5-10 लोग टीएलई से पीड़ित होते हैं, हालांकि आवश्यक नहीं कि टीएलई के ये सभी रोगी विख्यात ही हो जाएं। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर एवं इपीलैप्सी पर कई पुस्तकों के लेखक डॉक्टर ऑफ मेडिसिन स्टीवन सी. सैशर ने इतिहास में प्रसिद्ध महत्वपूर्ण ऐसे व्यक्तियों की सूची संकलित की है, जो संभवतः टीएलई से पीड़ित रहे हैं। इस सूची में दार्शनिक, लेखक, धार्मिक शख्सियत, चित्रकार, कवि, संगीतकार, अभिनेता व अन्य विख्यात लोग सम्मिलित हैं। सैशर लिखते हैं, ‘प्राचीन काल में लोग समझते थे कि बुरी आत्माओं अथवा शैतान का साया पड़ने के कारण मिर्गी का दौरा पड़ता है। ओझा सोखा मिर्गी को ठीक करने के लिए जादू-टोना करके बुरी आत्मा को उस व्यक्ति के शरीर से दूर भगाने का प्रयास करते थे। प्राचीन भारत के आयुर्वेदाचार्य ऐत्रेय और यूनान के हिपोक्रेट्स ने इस अंधविश्वास को चुनौती दी। इन दोनों ने दौरे का कारण किसी अलौकिक घटना को न मानते हुए कहा कि यह मस्तिष्क के सभी भागों के काम न करने के कारण होता है।’ वह कहते हैं, ‘इपीलैप्टिक दौरे में एक विशेष शक्ति और प्रतीकात्मकता होती है, जो ऐतिहासिक रूप से यह बताती है कि इसका संबंध रचनात्मकता अथवा असामान्य नेतृत्व क्षमता से होता है।

विद्वान उन प्रमाणों को लेकर सदा उत्सुक रहे हैं, जो यह बताते हैं कि महत्वपूर्ण पैगम्बर और उनके पवित्र आदमियों, राजनीतिक नेताओं और कला व विज्ञान में महानता प्राप्त करने वाले व्यक्ति इपीलैप्सी से पीड़ित रहे थे।

अरस्तू वह पहला विद्वान था, जिसने इपीलैप्सी को प्रतिभासम्पन्नता से जोड़ा। अरस्तू ने दावा किया कि सुकरात इपीलैप्सी से पीड़ित था। सैशर ने लिखा है कि कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मेडिसिन के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. जेरोम एंजेल मानते हैं कि इपीलैप्सी और प्रतिभाशीलता का संबंध एक संयोग होता है।

हालांकि सैशर आगे कहते हैं, ‘कई लोग इस बात से सहमत नहीं हैं, फिर भी उन्हें कुछ लोगों में इपीलैप्सी और प्रतिभाशीलता के बीच संबंध मिले हैं। ईव लाप्लैंट ने अपनी पुस्तक सीज्ड में लिखा है कि मस्तिष्क के जटिल भागों अर्थात टैम्पोरल लोब में दौरा पड़ना रचनात्मक चिंतन और कला प्रवणता उत्पन्न करता है। न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट डॉ. पॉल स्पायर्स बताते हैं: ‘कभी-कभी जो चीजें इपीलैप्सी का कारण होती हैं, वही व्यक्ति को विशेष प्रतिभाओं वाला भी बनाती हैं। यदि आप किसी व्यक्ति के जीवन के प्रारंभ के दिनों में उसके मस्तिष्क के किसी क्षेत्र को क्षतिग्रस्त कर दीजिए तो मस्तिष्क के दूसरा क्षेत्र के अति विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है।

यह एक रोचक सिद्धांत है। यदि स्पायर्स की बात मानें तो टीएलई नामक बीमारी रचनात्मकता अथवा प्रतिभा नहीं उत्पन्न करती है, बल्कि इस बीमारी के कारण मस्तिष्क के भीतर जो क्षति पहुंचती है, उसकी प्रतिपूर्ति के लिए मस्तिष्क के भीतर होने वाली प्रतिक्रिया के कारण ऐसा होता है।

आगे उन प्रतिभासम्पन्न लोगों की छोटी सी सूची है, जिन्हें सैशर मानते हैं कि ये लोग इपीलैप्टिक दौरे से पीड़ित थे।

हैरिएट टबमैन: यह एक अश्वेत महिला थीं, जिन्होंने कनाडा में स्वतंत्रता के लिए अमरीका के दक्षिण के अपने गुलाम साथियों का नेतृत्व किया था। वो अपने लोगों के बीच पैगम्बर मूसा कही जाती थीं।

संत पॉलः ये वो व्यक्ति हैं, जो ईसाई धर्म प्रचारकों (मिशनरियों) के सबसे बड़े अगुवा कहे जाते हैं और कहा जाता है कि इनके बिना ईसाइयत का यूरोप तक पहुंचकर विश्व का धर्म बनना संभव नहीं हो पाता।

जोन ऑफ ऑर्कः ये मध्यकालीन फ्रांस के एक दूरदराज के गांव के किसान की बेटी थीं। इन्होंने अपनी सैन्य विजयों के साथ इतिहास की धारा बदल दी। कहा जाता है कि 13 वर्ष की आयु में जॉन को रहस्यमयी प्रेरणा हुई और उन्होंने प्रकाश पुंज देखे, संतों की आकाशवाणी सुनी और फरिश्तों को देखा।

अल्फ्रेड नोबल: स्वीडन के रसायनशास्त्री और उद्योगपति ने डायनामाइट का अविष्कार किया था और नोबल पुरस्कार की स्थापना के लिए वित्तपोषण किया था।

दांतेः ला डिविना कॉमेडिया के लेखक थे।

सर वाल्टर स्कॉटः ये 18वीं सदी के रूमानी काल के अग्रणी साहित्यिक शख्सियत थे।

जॉन स्विफ्ट : ये अंग्रेजी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार थे और इन्होंने गुलीवर्स ट्रैवेल्स नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की है।

एडगर एलन पो 19वीं सदी के अमरीकी लेखक ।

लार्ड बायरन, पर्सी बाइशी शैली और अल्फ्रेड टैनीसनः तीनों अंग्रेजी के महान रूमानी कवि हैं।

चार्ल्स डिकेंसः ये विक्टोरिया कॉल के क्रिसमस कैरोल एंड ओलिवर ट्विस्ट जैसे शास्त्रीय पुस्तक के रचयिता हैं।

लेविस कैरोल: ये एलिस एडवेंचर इन वंडरलैंड नामक प्रसिद्ध पुस्तक के रचयिता हैं, जिन्होंने अपने टैम्पोरल लोब सीजर (दौरे) के कारण हुए अनुभव लिखे होंगे। एलिस एडवेंचर्स में कुंड में नीचे गिरने की व्याख्या से जो सनसनी महसूस होती है, वैसा अहसास दौरा पड़ने वाले अनेक लोगों में अक्सर पाया जाता है।

फ्योडोर दस्तोवस्की : ये महान रूसी उपन्यासकार हैं। इन्होंने क्राइम एंड पनिश्मेंट और ब्रदर्स कार्माजोव जैसी कालजयी पुस्तकें लिखी हैं। कहा जाता है कि यही वो लेखक थे, जिन्होंने पश्चिमी उपन्यास को परम ऊंचाई तक पहुंचाया।

मुहम्मद को पहली बार दौरा तब पड़ा था, जब वह पांच साल का था। दास्तोवस्की को पहली बार 9 साल की आयु में दौरा पड़ा था। बीच-बीच में कुछ समय को छोड़कर 25 साल की आयु तक वे दौरे की चपेट में आते रहे। अच्छे और बुरे दिनों के बीच ये दौरा कभी कुछ दिनों के अंतराल पर तो कभी महीनों के अंतराल पर आता। जब उन्हें भयानक दौरा पड़ता था तो उसके कुछ सेकंड पहले ऐसे रहस्यमयी अहसास होते थे, जैसे कि वे आनंद के सागर में गोता लगा रहे हों, लेकिन जैसे ही उन पर वह भयानक दौरा पड़ता था, सबकुछ बदल जाता था और वे खौफ के दर्दनाक अहसास में चले जाते थे। उनके अनुभव मुहम्मद के अनुभव जैसे होते थे, जैसे कि मुहम्मद देखता था कि भयानक दोजख है, जो दुख और यातना से भरा हुआ है और वहां लोगों को उनके कर्मों और कुकर्मों के आधार पर भयंकर सजाएं दी जा रही हैं। यहां उसके कुछ उदाहरण हैं, जो मुहम्मद ने देखा था:

जो ये दोनों (मोमिन व काफिर) दो भागीदार (फरीक) हैं। जो काफिर हैं, उन्हें कयामत के दिन आग का कपड़ा पहनाया जाएगा और उनकी मुंडियों पर खौलता हुआ पानी उड़ेला जाएगा। भयानक आग की गर्मी से उनके पेट में जो कुछ भी है (आंतें वगैरह) और खाल गल जाएगी। इसके अतिरिक्त उनको मारने के लिए लोहे के गुर्ज होंगे। जब सदमे के मारे दोज़ख से निकल भागना चाहेंगे तो उन्हें लोहे का गुर्ज मारकर अंदर धकेल दिया जाएगा और उनसे कहा जाएगा कि जलाने वाले अजाब के मजे चखो (कुरान. 22:19-22)

और जिन की नेकियों के पल्ले हल्के होंगे, वही लोग अपनी रूह को नष्ट कर चुके हैं और ये ही लोग जहन्नुम में हमेशा रहेंगे (कुरान. 23:103-104)

दोस्तोवस्की ने चुंधिया देने वाला प्रकाश देखा था। इसके बाद वह चिल्ला उठे थे और कुछ पल के लिए बेहोशी के आलम में आ जाते थे। कभी-कभी दौरे का प्रभाव पूरे मस्तिष्क में फैल जाता है तो यह उन्हें बड़ी भयानक मानसिक दर्द की स्थिति में पहुंचा देता है। ऐसा दौरा पड़ने के बाद वे घटनाओं को याद नहीं रख पाते थे और उन्हें यह भी स्मरण नहीं रहता था कि जब उन्हें दौरा पड़ा था तो उन्होंने क्या बातें की थीं। वो अक्सर कई दिनों तक अवसादपूर्ण स्थिति में चले जाते थे, चिड़चिड़े हो जाते थे, स्वयं को दोषी मानने लगते थे।

काउंट लियो टॉलस्टॉयः ये अन्ना कैरेनीना और वार एंड पीस नामक पुस्तक के रचयिता 19वीं शताब्दी के रूसी लेखक थे और ये भी इपीलैप्सी के शिकार थे।

गुस्ताव फ्लाबर्ट ये साहित्य जगत का बड़ा नाम है। 19वीं शताब्दी के इस फ्रांसीसी साहित्यिक प्रतिभा ने मैडम बोवेरी और ए सेंटीमेंटल एजूकेशन नाम की अद्भुत चीजें लिखी हैं। सैशर के मुताबिक, ‘फ्लाबर्ट को शुरू में लगता था कि जैसे उन पर दुर्दिन आने वाले हैं, जिसके बाद वे स्वयं को बहुत असुरक्षित महसूस करने लगते थे और उन्हें लगता था कि मानो वो किसी और दुनिया में चले गए हों। उन्होंने लिखा कि जब दौरे पड़ते थे तो उन्हें लगता था कि उनके मन में विचारों और कल्पनाओं का भंवर तैर रहा हो और उस दौरान ऐसा लगता था कि उनकी चेतना समुद्र में आए तूफान के समय डूब रही नौका की तरह लुप्त हो रही है।’ वह विलाप करते थे, पुरानी यादों के भंवरजाल में उलझ जाते थे, भयानक सपने देखते थे, मुंह से झाग निकलता था और दाहिना हाथ अपने आप हिलने लगता था, करीब दस मिनट तक ऐसा लगता था कि जैसे समाधि की अवस्था में चले गए हों और फिर इसके बाद उल्टियां करते थे।

डेम अगाथा क्रिस्टी ये ब्रिटेन की अग्रणी जासूसी उपन्यासकार थीं। कहा जाता है कि इन्हें भी इपीलैप्सी की समस्या थी।

टूमैन कैपोतः ये इन कोल्ड ब्लड और ब्रेकफास्ट एट टिफैनीज नामक पुस्तकों के लेखक हैं। जार्ज फ्रेडरिक हैंडेलः ये महान वायलिन वादक थे और द मसीहा निकोल पैगिनी नामक अलबेले संगीत के रचयिता थे।

पीटर तैकोवस्की : ये स्लीपिंग ब्यूटी और द नटक्रैकर जैसे बैले को कंपोज करने वाले प्रख्यात रूसी संगीतकार थे।

लुडविंग वैन बीथोवेनः महान शास्त्रीय संगीतकारों में से एक थे।

सैशर कहते हैं, ‘ये उन बहुत से प्रसिद्ध व्यक्तियों में से कुछ उदाहरण हैं, इतिहासकारों ने जिनके ऊपर दौरा पड़ने का साक्ष्य दर्ज किया है।’ वास्तव में ऐसे प्रसिद्ध व्यक्तियों की सूची लंबी है, जिनमें इपीलैप्सी के लक्षण पाए गए अथवा जिनके इस बीमारी की चपेट में होने का संदेह था। मुहम्मद की संगत खराब नहीं थी। मुहम्मद की कल्पनाशीलता, उसके अवसाद, उसके आत्मघाती विचार, मजहब में उसकी रुचि, कयामत और मौत के बाद की दुनिया को लेकर उसकी दृष्टि, आकाशीय आवाज सुनायी देने का भ्रम होना और उसकी अनेक शारीरिक व मनोवैज्ञानिक विशेषताओं की व्याख्या टैम्पोरल लोब इपीलैप्सी (टीएलई) नामक बीमारी का विशेषण करते हुए की जा सकती हैं। हालांकि इस बीमारी के विवरण से यह नहीं पता चलता है कि मुहम्मद इतना क्रूर, हैवान, दयाहीन, सामूहिक हत्यारा और अड़ियल स्वभाव वाला क्यों था ? मुहम्मद में ये बुराइयां उसके मनोविकारी आत्म-मोह (नार्सिसिज्म) के कारण थीं। ये बुराइयां उसके व्यक्तित्व के विकार और मानसिक विकार के योग से आईं थीं और इन्हीं बुराइयों ने उसे एक परिघटना बना दिया। मुहम्मद अपने मन में आडम्बरपूर्ण भव्यता पाने और दुनिया में सबसे ताकतवर होने के विचार पाले रखता था। मुहम्मद की उन्मादी सोच उसके शेखचिल्लीपन की पुष्टि करती है और इसी सोच के कारण वह मानने लगा कि वह अल्लाह के रसूल के रूप में चुना गया है। मानो यही काफी नहीं था, उसने तो शादी भी एक ऐसी ‘परजीवी’ औरत से की, जो शौहर की झूठी बड़ाई करने में अपनी महानता समझती थी। मुहम्मद अपने पैगम्बरी के मिशन को लेकर आश्वस्त था। यह उसका स्वयं में आत्मविश्वास मजबूत होना ही था कि वह अपने निकट के लोगों को प्रेरित कर सका और अपने ऊपर भरोसा करने के लिए तैयार कर सका। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि कुरान की सारी आयतें तभी कही गईं, जब उसे दौरा पड़ता था। बाद के वर्षों में संभवतः उसे दौरा पड़ना बंद हो गया था। फिर भी वह अपने मत को बिलकुल सही मानता था और इसीलिए जैसे-जैसे उसको आवश्यकता पड़ी, वह नई-नई आयतें गढ़ता गया।

एक नार्सिसिस्ट के रूप में मुहम्मद अपने अनुयायियों से अपनी बात मनवाता था। यह बता पाना कठिन है कि कौन किसे मूर्ख बना रहा था। मुहम्मद अपने दावों को लेकर निश्चिंत था- यहां तक कि जब भी आवश्यकता होती तो वह झूठ के मुलम्मे में एक आयत गढ़ देता था और फिर जब लोग उसकी इन मनगढ़ंत व झूठी बातों पर भरोसा करने लगते तो वह आश्वस्त हो जाता था। परिणाम यह हुआ कि उसे लगने लगा कि उसके पास उन लोगों को जो उससे असहमति रखते हैं, सजा देने का दैवीय अधिकार है। वह अल्लाह की आवाज था और उसके विरोध का अर्थ अल्लाह का विरोध था। वह झूठ बोलना अपना वैधानिक अधिकार मानता था। उसका मानना था कि वह झूठ महान उद्देश्यों के लिए बोल रहा है और इसलिए वह झूठ उचित है। जब उसने निरीह लोगों को लूटा, उनकी हत्याएं की तो उसके मन में कोई किंतु-परंतु नहीं था। उसकी मारकाट इतनी सफल रही कि उसे लगा ये सब जिस तरह भी मिले, सब जायज है। वह अपने दिवास्वप्न में इतना डूबा था कि उसे अपने रास्ते में आने वाले किसी भी व्यक्ति की हत्या करना खराब नहीं लगता था। आगे दी गई कुरान की आयतें इसकी गवाही स्वयं दे रही हैं।

और जो कोई भी अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म नहीं मानेगा और अपनी हद से बाहर जाएगा, उसे अल्लाह जहन्नुम की आग में झोंकेगा और वहां उसे जलालत भरी कठोर सजा मिलेगी (कुरान. 4:14) वे लोग जो इस्लाम व अल्लाह में विश्वास नहीं कर कुफ्र अख्तियार करते हैं और रसूल के हुक्म को नहीं मानते, उस दिन इच्छा करेंगे कि काश वह पेवंदे खाक हो जाते (दफन हो जाते) अर्थात उनके ऊपर की जमीन बराबर कर दी जाती। पर ये लोग अल्लाह से कोई बात उस दिन छुपा भी न सकेंगे। ( कुरान 4:42 )

जो कोई भी अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म नहीं मानता है, वह निश्चित ही जहन्नुम की आग में हमेशा जलता रहेगा। (कुरान. 72:23)

कामुकता, धार्मिक अनुभव और टैम्पोरल लोब हायपर एक्टिवेशन
हदीसों में मुहम्मद के यौन व्यवहारों का उल्लेख है। क्या TLE बीमारी यौन क्षमता पर भी प्रभाव डालती है ? यदि ऐसा है और इसके प्रकाश में मुहम्मद की यौन आदतों के बारे में बताया जा सकता है तो हमारे पास इस बात का एक और साक्ष्य होगा कि वह TLE नामक बीमारी से पीड़ित था। स्नायुविज्ञान के विशेषज्ञ रॉन जोसफ का मानना है कि टीएलई का विशेषण करते हुए यौन व्यवहारों के बारे में जाना जा सकता है। वह लिखते हैं:

ऐसा नहीं है कि अंगतंत्र के उच्च स्तर और मस्तिष्क के निचले भाग में असामान्य उत्तेजक गतिविधि से लैंगिकता में परिवर्तन के साथ ही धार्मिक उन्माद गहरा होना दुर्लभ लक्षण हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि केवल आज के ही धर्म प्रचारक नहीं, बल्कि इब्राहीम, याकूब और मुहम्मद सहित पुराने समय के धार्मिक नेता अति कामुक हुए। इन सबने कई लोगों के साथ यौन संबंध बनाए, दूसरे की बीबियों के साथ यौन संबंध बनाए, मुहम्मद और किंग दाऊद ने तो दूसरे की बीबियों को हासिल करने के लिए उनके पतियों की हत्याएं तक कीं। कई नबियों और मजहबी शख्सियतों में तो Kluver Bucy सिंड्रोम के लक्षण साफ दिखे। जैसे कि जानवरों का मैला खाना, साथ ही मस्तिष्क के किसी भाग, विभ्रम उत्पन्न होने के साथ शरीर के अंगों में अति उत्तेजना होना व मिर्गी आना, पेशियों का तन जाना, पागलपन अथवा भाषागत विसंगति होना आदि जैसे लक्षण ।

जहां मूसा को बोलने में समस्या होती थी, वहीं अल्लाह का रसूल मुहम्मद प्रत्यक्ष रूप से लिखना और पढ़ना नहीं सीख सका। (यह एक तरह की मानसिक विकृति है, जो पूरा या आंशिक रूप से लिखने में अक्षम बनाती है)। इसके अतिरिक्त अल्लाह के संदेश को प्राप्त करने के लिए मुहम्मद अचेतन हो जाता था और बेहोशी की अवस्था में पहुंच जाता था (आर्मस्ट्रांग 1994, लिंग्स 1983 ) । वास्तव में मुहम्मद ने पहली बार आध्यात्मिक-धार्मिक वार्तालाप तब किया जब सबसे बड़े फरिश्ते जिब्राईल ने उसे नींद से झकझोर कर उठाया और उसे इस तरह भींच लिया कि डर के मारे उसकी सांसें अटक गई थीं। बार-बार जोर से भींचने और मरोड़ने के बाद जिब्राईल ने मुहम्मद को आदेश दिया कि वह अल्लाह की वाणी कुरान बोले। यह मुहम्मद के साथ फरिश्ते जिब्राईल द्वारा की गई उन बहुत सारी घटनाओं में पहली थी। मुहम्मद के सामने जिब्राईल कभी-कभी प्रतिक्षण बदलने वाली दैत्याकार छवि लेकर प्रकट होता था।

अल्लाह या उसके फरिश्ते की आवाज के अनुसरण में मुहम्मद न केवल बोलने लगा, बल्कि वह करीब 23 सालों तक अल्लाह के विभिन्न प्रसंगों को यूं ही पढ़ना और जपना शुरू कर दिया। मुहम्मद के लिए यह अनुभव बेहद पीड़ादायी और विदारक था (आर्मस्ट्रांग 1994, लिंग्स 1983 )। बताया जाता है कि मजहबी उन्माद के अतिरिक्त मुहम्मद के पास 40 आदमियों जितनी यौन ताकत थी और वह 9 बीवियों और जाने कितनी रखैलों के साथ सोता था, जिसमें एक युवा लड़की भी शामिल थी (लिंग्स 1983)। एक बार उसे जब झिड़का गया तो वह ध्यान में चला गया और फिर दावा करने लगा कि अल्लाह ने उससे कहा कि किसी और की बीबी उसकी बीबी बनेगी।

वह (मुहम्मद) इस बात के लिए भी कुख्यात था कि उसे अपार गुस्सा आता था और वह गैर-मुसलमानों, व्यापारियों और विरोध करने वालों को मार डालता था (या मार डालने का आदेश देता था)। जब अति कामुकता, अति मजहबी उन्माद, गुमसुम रहने, मिजाज में अचानक बदलाव और दैत्याकार फरिश्ते को देखने या सुनने का विभ्रम आदि के साथ इस तरह का व्यवहार हो तो यह स्पष्ट रूप से अंगतंत्र प्रणाली और मस्तिष्क के भीतरी भागों त्रासंबंधी विकार की स्थिति की ओर संकेत करता है। यह विकार इन रहस्यमयी अनुभवों का मूल हो सकता है। वास्तव में मुहम्मद अवसाद की गंभीर बीमारी से भी पीड़ित था। एक बार तो उसने अवसाद की इसी अवस्था में चट्टान से कूदकर जान देने की कोशिश भी की थी यह प्रयास इसलिए, ताकि महादेवदूत जिब्राईल आकर उसे आत्महत्या करने से रोके।

मुसलमानों में यह सामान्य धारणा है कि मुहम्मद के पास कई मर्दों की यौन क्षमता थी। यह धारणा कई हदीसों के आधार पर है। एक हदीस में मुहम्मद की नौकरानी सलमा के हवाले से कहा गया है: ‘मुहम्मद की सभी 9 बीबियां उसके पास थीं। ये वो औरतें थीं, जो मुहम्मद के मरने तक उसकी बीवियां थीं। (मुहम्मद की कई ऐसी बीबियां भी थीं, जिन्हें उसने तलाक दे दिया था।) मुहम्मद रात में उन सबके साथ बारी-बारी से सोता था। जब एक बीबी के साथ निपटकर आता था तो अंगों को धोने के लिए मुझसे पानी मांगते थे। मैंने कहा, ओ अल्लाह के रसूल! ! क्या एक बार धो लेना काफी नहीं है। उन्होंने उत्तर दिया, बार-बार अंगों को धोना अच्छा और स्वच्छता के लिए है।

हालांकि अनुसंधान से यह निष्कर्ष निकलता है कि मुहम्मद की मर्दानगी का दावा बकवास है और सच यह है कि अपने जीवन के आखिरी दो दशक में वह नपुंसक हो गया था। मुहम्मद के भीतर अतृप्त काम वासना थी और अपनी इस अतृप्त इच्छा को संतुष्ट करने के लिए वह बीबियों व रखैलों को सहलाकर और चूम-चाटकर ही काम चला लेता था, क्योंकि वह संभोग करने में समर्थ नहीं था।

नीदरलैंड के यूट्रेट विश्वविद्यालय में अनुसंधानों से पता चलता है कि दिमाग में उत्पन्न होने वाले तथाकथित सुखद अहसास वाले रसायन एंडोजेनस ऑपिऑइड्स यौन भूख तो बढ़ाते हैं, लेकिन यौन क्षमता को घटा देते हैं (246 एक और अध्ययन में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि अतिवाद और अवसाद के मरीजों में उन्माद के दौरान ऑपिऑइड्स की सक्रियता काफी बढ़ी हुई होती है । नार्सिसिस्ट के रूप में मुहम्मद का मिजाज अचानक बदल जाता था। कभी-कभी वह अति आनंदित और ऊर्जावान महसूस करता था तो कभी वह अवसाद की उस गहरी स्थिति में चला जाता था कि उसके मन में आत्महत्या के विचार आने लगते थे। ये निष्कर्ष बताते हैं कि मुहम्मद के पास अनेक युवा औरतें होने के बावजूद उसमें इतनी तीव्र यौनेच्छा क्यों रहती थी और उसकी अधिकतर बीबियों के बच्चे क्यों नहीं हुए। इससे साबित होता है कि मुहम्मद संभोग कर पाने में अक्षम था।

फिर भी मेरे इस सिद्धांत में एक भेद है, वह यह कि यदि मुहम्मद अपने बाद के जीवन में नपुंसक हो गया था तो जब वह 60 या इससे अधिक उम्र का था तो इब्राहीम नामक बच्चे का बाप कैसे बना? इब्राहीम मारिया नाम की घुंघराले बालों वाली सुंदर लौंडी (कोप्टिक यानी ईसाई गुलाम) से पैदा हुआ था। मुहम्मद की दूसरी बीवियां मारिया से जलती थीं और उसे पसंद नहीं करती थीं। मुझे संदेह था कि यह बच्चा इब्राहीम मुहम्मद का नहीं, बल्कि किसी और का था, पर इसका कोई साक्ष्य नहीं मिल रहा था। तभी मुझे इब्ने साद द्वारा बताई गई एक घटना पढ़ने को मिली।

इब्ने – साद ने लिखा है कि मदीना में एक ईसाई (कोप्टिक) आदमी मारिया से मिलने जाया करता था। यह अफवाह फैल गई थी कि वह उसका प्रेमी था। चूंकि मुहम्मद की अन्य बीबियां मारिया से खार खाती थीं, इसलिए उसे मदीना के उत्तर में स्थित एक बाग में रखा गया। जब मारिया और उस ईसाई व्यक्ति के संबंधों की बात उड़तीउड़ती मुहम्मद तक पहुंची तो उसने अली को उस ईसाई व्यक्ति की हत्या करने के लिए भेजा।

जब उस ईसाई व्यक्ति ने अली को अपनी ओर आते देखा तो उसने तुरंत अपने नीचे के कपड़े हटा दिए और अली ने देखा कि उसके पास यौनांग नहीं थे, फिर अली ने उसे छोड़ दिया ।” दरअसल, लोगों की जुबान बंद करने के लिए ही यह सुविधाजनक बहाना बनाया गया, ताकि लोग मारिया के उस प्रेमी की बात करना बंद कर दें। मुहम्मद की सबसे छोटी बीबी आयशा की मदीना के सफवान नामक युवक से प्रेम संबंध होने की बातें भी हवाओं में तैर रही थीं। इस बात को लेकर हल्ला-गुल्ला भी हुआ। आयशा ने पहले तो इस आरोप को ही झूठा बताया, पर जब बात बढ़ने लगी तो उसने दावा किया कि सफवान हिजड़ा था।

तबरी ने उस ईसाई व्यक्ति का उल्लेख यूं किया है:
अल्लाह के रसूल के पास मअबूर नाम का एक हिजड़ा था, जो उन्हें मकोकस ने दो गुलाम लड़कियों के साथ भेंट किया था। इनमें से एक लड़की मारिया थी, जिसे मुहम्मद ने अपनी रखैल बना लिया था और दूसरी लड़की सीरीन थी। मुहम्मद ने सीरीन को तब हस्सान बिन साबित को दे दिया, जब सफवान बिन अल-मुअत्तल ने उनके विरुद्ध अपराध किया। मकोकस ने दोनों गुलाम लड़कियों को मदीना भेजते समय इस हिजड़े को उनकी पहरेदारी के लिए लगाया था। जब वे पहुंचे तो मुहम्मद को ये लड़कियां भेंट की। यह कहा जाता है कि यही हिजड़ा था, जिसके साथ मारिया के यौन संबंध होने के आरोप लगे थे और मुहम्मद ने अली को इसे ही मारने के लिए भेजा था। जब उसने अली को देखा तो उसके इरादों को समझ गया। फिर उसने खुद को नंगा कर लिया और तब यह बात साफ हुई कि उसके आदमियों वाले यौनांग पूरी तरह काटकर हटा दिए गए थे। इसके बाद अली ने उसे छोड़ दिया।
उस ईसाई व्यक्ति को निर्दोष सिद्ध करने के लिए उसके हिजड़ा निकलने की कहानी पूरी तरह गढ़ी गई है। सोचिए जरा, कि अल्लाह के रसूल ने उसे मारने के लिए अली को क्यों भेजा था ? उस आदमी को यह कैसे पता चला कि अली उसे मारने ही आ रहा है? एक और जगह कहा गया है कि माबूर बहुत वृद्ध हो चुका था। यह भी पाठकों को उलझाने के लिए ही लिखा गया। मकोकस ने मअबूर को मुहम्मद को उपहार के रूप में दिया था। वह उस लंबी यात्रा के दौरान मारिया और उसकी बहन सीरीन की सुरक्षा के लिए लगाया गया था ? यह बात पल्ले नहीं पड़ती है कि मकोकस ने इन लड़कियों की सुरक्षा के लिए एक वयोवृद्ध व्यक्ति को लगाया होगा। ऐसा करना एक उभर रहे तानाशाह का अपमान करना होता, खासकर तब जबकि मकोकस इस तानाशाह की खुशामद करना चाहता था। दूसरे व्यक्ति के साथ मारिया के यौन संबंध को छिपाने और इससे हो रही बदनामी से बचने के लिए इस तरह की कहानियां गढ़ी गईं। खासकर ऐसे पितृसत्तात्मक समाज में जहां सम्मान के लिए हत्या करना आज भी चलन में है, इस तरह के किस्से गढ़ना सामान्य है। मुहम्मद ने लिखित रूप से यह दावा किया है कि जब मारिया की कोख से इब्राहीम पैदा हुआ तो फरिश्ते जिब्राईल ने ‘अस्सलाम अलैकुम या अब्बा इब्राहीम’ कहते हुए सलाम किया और उसे बताया कि वह उसका बाप है।

यह हदीस बाद के दिनों में जालसाजी के लिए लिखी गई होगी, ताकि मुहम्मद की बीबियों के दूसरे मर्दों के साथ संबंधों पर पर्दा डाला जा सके। प्रश्न यह उठता है, जिब्राईल को इसकी पुष्टि क्यों करनी पड़ी कि इब्राहीम का बाप मुहम्मद है? क्या मुहम्मद को इब्राहीम का बाप होने पर संदेह था और जिब्राईल द्वारा उसे ‘ अब्बा इब्राहीम’ अर्थात इब्राहीम का बाप पुकारने की कहानी इन बातों पर विराम लगाने के लिए गढ़नी पड़ी? मुहम्मद के लिए यह झूठ बोलना सुविधाजनक था। उसने इब्राहीम को अपनी औलाद होने का दावा किया, ताकि उसकी मर्दानगी पर कोई सवाल न उठाए जाएं। खदीजा के अलावा मारिया ही वह औरत थी, जिससे मुहम्मद को एक बेटा हुआ, लेकिन इस तथ्य के बावजूद मुहम्मद ने कभी मारिया से शादी नहीं की। जबकि मारिया बेहद सुंदर थी।

इब्ने-साद बताता है कि जब इब्राहीम पैदा हुआ तो मुहम्मद उसे आयशा के पास ले गया और बोला, ‘देखो, यह बिलकुल मेरी तरह दिखता है।’ आयशा ने कहा, ‘मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लग रहा।’ तब मुहम्मद ने कहा, ‘क्यों, तुम्हें इसके गोरे और भरे हुए गाल नहीं दिख रहे ?’ इस पर आयशा ने जवाब दिया, ‘सभी बच्चों के गाल फूले हुए होते हैं। निश्चित रूप से यह लड़की आयशा बहुत सयानी थी।

यह दावा कि मुहम्मद के पास 40 मर्दों के बराबर यौन ताकत थी, बिलकुल झूठ है। यह दावा इसलिए किया गया है ताकि इस तथ्य को छिपाया जा सके कि मुहम्मद नपुंसक था। मुहम्मद को खदीजा से सात बच्चे थे और खदीजा उस वक्त ही 40 साल की थी, जब उसने उससे शादी की थी। खदीजा से उसके बच्चे तब हुए थे, जब वह 25 से 35 साल की अवस्था में था। जीवन के शेष 10 सालों में मुहम्मद के पास करीब 20 युवा बीबियां और रखैलें थीं, पर इनमें से किसी से कोई बच्चा नहीं हुआ।

फ्रांसीसी स्नायुविज्ञान शास्त्री हेनरी जीन पास्कल गैसटाउट (1915-1995) कहते हैं, ‘1950 से ही अनुसंधानकर्ताओं ने यह पता लगा लिया है कि इपीलैप्सी से पीड़ित आदमी में यौनेच्छा तो तीव्र होती है, लेकिन उसका लिंग शिथिल होता है।और व्यक्ति में प्रिचर्ड प्रोलैक्टिन नामक हार्मोन के तत्व के स्तर को बढ़ा देता है, जिससे यौनेच्छा बढ़ जाती है, पर इपीलैप्सी का दौरा आने पर आदमियों में यौन अक्षमता व लिंग शिथिलता आ जाती है।

हमने पहले ही पढ़ा है कि मुहम्मद कल्पना करता था कि वह संभोग कर रहा है, जबकि वास्तव में वह संभोग नहीं कर रहा होता था। एक और हदीस यह बताती है कि मुहम्मद अपनी बीबियों के साथ संभोग नहीं करता था, बल्कि उन्हें केवल सहलाता और चूमता चाटता था। इसमें लिखा है कि मुहम्मद हर रात अपनी सभी बीबियों के पास जाता था और उनसे संभोग नहीं करता था, बल्कि केवल चूमता चाटता था। आयशा के हवाले से कहा गया है, ‘तुममें से किसी के पास रसूल जैसा आत्मनियंत्रण नहीं है। देखो वह अपनी बीबियों को खूब चूमते-चाटते हैं, पर संभोग करने से खुद को रोक लेते हैं। आयशा एक छोटी बच्ची थी। वह संभवतः यह जान नहीं पाती थी कि मुहम्मद आत्मनियंत्रण नहीं कर रहा है, बल्कि वह संभोग करने में असमर्थ है, इसलिए बीबियों को केवल चूम-चाटकर रह जाता है। आयशा ने एक और जगह कहा है, ‘मैंने रसूल के लिंग को कभी नहीं देखा।

मैं यह निर्णय पाठकों पर छोड़ता हूं कि आयशा ने ऐसा क्यों कहा होगा।

क्या इसका यह अर्थ नहीं निकलता है कि मुहम्मद में काम (सैक्स) को लेकर उतनी उत्कट इच्छा नहीं रहती थी ? अन्यथा वह यौन संबंध बनाने के अवसरों को छोड़ता क्यों ? काम के प्रति उसकी अतृप्त इच्छा ही यह बताती है कि उसके हरम में इतनी सारी औरतें होने के बावजूद उसकी यौन पिपासा शान्त नहीं हुई। एक हदीस में कहा गया है कि जब उसने बनू जौन कस्बे पर हमला किया तो उसके सामने जौनिय्या नाम की लड़की आया के साथ लाई गई। रसूल ने उससे कहा, ‘तुम स्वयं को मुझे उपहार स्वरूप दे दो। (आज की भाषा में कहें तो इसका अर्थ हुआ कि मुझे अपने साथ हमबिस्तर होने दो।) ‘ उस लड़की ने जवाब दिया, ‘एक राजकुमारी किसी अदने से आदमी को खुद को कैसे सौंप सकती है ?’ तब गुस्से में मुहम्मद ने उसे मारने के लिए हाथ उठाया तो वह चीख पड़ी, ‘मैं तुमसे कह रही हूं कि अल्लाह के वास्ते छोड़ दो। मुहम्मद इस पर रुक गया। क्षणभर के लिए उसमें ग्लानि की भावना आई और अपने एक अनुयायी को हुक्म दिया कि उस लड़की को सफेद लिनेन के दो कपड़े दे। यह स्पष्ट है कि मुहम्मद और उसका लुटेरा गिरोह उन कपड़ों को अपने साथ नहीं लाया था, न ही वे खरीदे गए थे, बल्कि उसी लड़की के घर से या उसके ही कबीले के लोगों से लूटे गए थे।

जौनिय्या अवश्य बच्ची रही होगी, तभी उसके साथ एक आया थी। उसने यह कहकर कि ‘एक राजकुमारी खुद को किसी अदने से आदमी के हवाले क्यों करे’ एक ऐसे इंसान को साहसी उत्तर दिया था, जो उसकी हत्या करने की ताकत रखता था। इससे भी पता चलता है कि वह एक छोटी बच्ची थी। मुहम्मद ने इस लड़की से कहा था कि वह खुद को उसको सौंप दे। पर अनुवादक ने चालाकी से इस वाक्य के साथ कोष्ठक में शादी शब्द जोड़ दिया । जबकि अरबी के मूल पांडुलिपि में यह शब्द हिबा है। हिबा का अर्थ उपहार होता है और यहां इसका अर्थ फ्री सैक्स से है। जब कोई औरत किसी आदमी के सामने खुद को हिबा के रूप में पेश करती है तो आज के अर्थों में कहा जा सकता कि वह एक रात के लिए उसके साथ हमबिस्तर होने जा रही है। हिबा शब्द शादी के लिए कभी इस्तेमाल नहीं हुआ। मुहम्मद ने अपने हाथ उठाए, ताकि उसकी पीठ पर हाथ फेरकर उसे शांत कर सके। उस लड़की को शांत करने की जरूरत क्या थी? जाहिर है, मुहम्मद ने उस लड़की से जो कहा था, वह अपमानजनक था और इसलिए वह गुस्से में आ गई थी। वह लड़की क्यों चीखी कि ‘अल्लाह के वास्ते छोड़ दो ?’ यदि मुहम्मद उसे थपकी देकर केवल शांत कर रहा था तो उसे अल्लाह का वास्ता देकर छोड़ने की बात कहने की क्या आवश्यकता थी? जैसा कि अनुवादक चाहता है कि हम यही विश्वास करें कि मुहम्मद उस लड़की को प्यार से शांत करने की कोशिश कर रहा था, जबकि सच्चाई यह थी कि वह उसे जोर से पीट रहा था। वह लड़की डर के मारे क्यों चीखी थी ? जब लड़की चीखी तो मुहम्मद ने अपने हाथ हवा में रोक दिए और उसे नहीं मारा। फिर इसके बाद उसे अपराध बोध हुआ और उसने उसी से लूटे हुए दो वस्त्र उसे वापस कर दिए। बात स्पष्ट है और कोई भी समझदार इंसान अनुमान लगा सकता है कि वास्तव में क्या हुआ होगा। अनुयायियों द्वारा लिखे गए मुहम्मद के किस्सों को गहराई से पढ़िए तो सामने आ जाता है कि इन लोगों ने एक राक्षस को पवित्र इंसान साबित करने की पूरी कोशिश की है।

विशेषकर जब अरबी में लिखे गए उन किस्सों का अनुवाद किया गया तो मुहम्मद नामक राक्षस के कुकृत्यों को छिपाने की और अधिक कोशिश की गई। आपको मुहम्मद के नामर्द अर्थात नपुंसक होने पर संशय होता है या यह केवल अनुमान लगता है तो आपको यह हदीस पढ़नी चाहिए। आपका संदेह दूर हो जाएगा।

इब्ने-साद उद्धरण देता है, ‘अल्लाह के रसूल कहा करते थे कि मैं उन लोगों में से था, जिनके पास संभोग करने की क्षमता न के बराबर होती है। तब अल्लाह ने मुझे पके हुए गोश्त का एक कटोरा भेजा। जबसे मैंने इसे खाया, मुझे वह ताकत मिल गई कि जो चाहूँ, वो कर सकता हूं।

यह वास्तव में मुहम्मद द्वारा अपने मुख से अपनी कमजोरी स्वीकार किया जाना है। अब आप स्वयं निर्णय कीजिए कि क्या इस कपोल कल्पित किस्से पर विश्वास किया जा सकता है ? क्या अल्लाह को अपने प्रिय रसूल के नामर्दी के रोग की इतनी चिंता थी कि उसने गोश्त का कटोरा भेजा, ताकि उसकी नपुंसकता दूर की जा सके ? अथवा इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि अहंकारोन्मादक पुरुष सत्तावादी रसूल केवल डींगे हांक रहा था और अपनी नपुंसकता छिपाने का प्रयास कर रहा था, जैसा कि अधिकांश अरबी पुरुष करते हैं। क्योंकि वे यौन क्षमता को मर्दानगी का प्रतीक मानते हैं और अपनी इस क्षमता को लगातार बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।

यहां प्रश्न यह है कि अल्लाह ने मुहम्मद के सिर में होने वाली गंभीर पीड़ा (माइग्रेन) को दूर करने के लिए कोई चीज क्यों नहीं भेजी ? कौन से जानवर का गोश्त ऐसा है, जिसमें यौनवर्द्धक यानी वियाग्रा का प्रभाव होता है ? एक अन्य हदीस में मुहम्मद कहता है, ‘जिब्राईल ने मुझे एक गोश्त का छोटा सा कटोरा लाकर दिया। मैंने उसे खाया और मुझमें एक साथ 40 मर्दों जितनी यौन ताकत आ गई।

हदीसों के अन्य किस्सों की तरह यह किस्सा भी गढ़ा गया, ताकि यह बात छिपाई जा सके कि मुहम्मद में यौन क्षमता कम थी। इतने अहंकारी नार्सिसिस्ट को नामर्द के रूप में संभवतः नहीं देखा जाएगा। मुहम्मद के जीवन के रहस्यों को जानना हो तो उसकी आत्मकथा की गहराई से पढ़नी चाहिए। बड़ी विचित्र बात है कि जिस दिन इब्राहीम की मौत हुई, मुहम्मद मस्जिद गया और वहां इबादत करने के बाद उसने जो उपदेश दिया, उसमें यह भी बताया कि व्यभिचार और व्यभिचारियों को जहन्नुम में क्या सजा मिलेगी। उसने मस्जिद के मंच से कहा:

ओ मुहम्मद के अनुयायियो ! अल्लाह के वास्ते! कोई नहीं है, जिसमें उतनी गैरत (शर्मो-हया) हो, सिवाय अल्लाह (पढ़ें मुहम्मद) के। जैसा कि उसने अपने मर्द और औरत दोनों गुलामों को व्यभिचार (अवैध संबंध बनाने) से मना किया है। ओ, मुहम्मद के अनुयायियो ! जब तुम्हें पता चलेगा कि मैं वह सब जानता हूं तो तुम सब हंसने के बजाय रोओगे।

गैरत किसी व्यक्ति की लाज शर्म और सम्मान को कहते हैं। व्यक्ति की गैरत तब आहत होती है जब उसकी किसी चीज या उसके किसी व्यक्ति पर हाथ डाला जाए। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी मुसलमान की बीबी, बहन या बेटी को छूते हैं अथवा वे आपसे मुहब्बत का रिश्ता बना लें तो उसकी गैरत पर आंच आती है। परिणामतः वह व्यक्ति अपनी इज्जत को फिर से बनाने के लिए पलटवार करेगा। यदि उसे लगेगा कि उसकी इज्जत अधिक चली गई है तो वह या तो आपकी हत्या कर सकता है या आपसे प्यार करने वाली उस महिला या रिश्तेदार की हत्या कर सकता है।

तब कहीं जाकर उसका सम्मान लौटेगा और जो बदला नहीं लेते हैं, माना जाता है कि उनमें गैरत या लाज शर्म नहीं बची है। ध्यान दीजिए, मुहम्मद अल्लाह की गैरत की बात कर रहा है। यदि अल्लाह की कोई महिला रिश्तेदार नहीं हैं तो उसकी गैरत पर आंच कैसे आ सकती है ? यह पहचान पाना मुश्किल नहीं है कि मुहम्मद ने स्वयं को ही अल्लाह के रूप में देखा था। वह अपनी स्वयं की गैरत की बात कर रहा था। वह मारिया के चरित्र पर संदेह करता था। अपने बच्चे को दफनाने के वक्त व्यभिचारियों की सजा के बारे में उग्र और बेतुका उपदेश वह और किसी को नहीं, बल्कि मारिया को दे रहा है। अल्लाह और कोई नहीं, बल्कि मुहम्मद की सनक और अहंकार था। तब इस पर और जोर देने के लिए मुहम्मद ने कहा, ‘मुझे अभी जहन्नुम की आग दिखाई दी है और इससे पहले मैंने इतना भयानक और बुरा मंजर कभी नहीं देखा था।

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