मैं कुल शील चारिणी
/// मैं कुल शील चारिणी///
मुझे नहीं अब अच्छे लगते,
तुम्हारे यह मन रंजन गीत।
यह सब अब कलरव लगते ,
इसे विलग जीवन की रीत।।
विष बुझा मधु जहां हो,
वहां मधुता की धारा कैसी।
मैं हूं जीवन संगिनी तुम्हारी,
तब नर्तकी मधुबाला कैसी।।
अब न नर्तकी बाला बनकर,
रंग महल में आऊंगी।
रंग महल के रंगकर्म वर्तन में,
रंग नर्तन जीवन शाला कैसी।।
जीवन यदि प्रेम प्रणय है,
तो यह विक्रीत रंजन कैसा।
कुलाचार वर्तन प्रेम परीक्षा,
जीवन में मलयानिल जैसा।।
प्रीत जहां की रीत नहीं,
वहां सुलभ जीवनचर्या कैसी।
मुझको अर्धांगिनी कहते हो,
क्यों मैं मलिन वासिनी जैसी।।
तुम वरीत पति हो मेरे,
मैं तुम्हारी सहचारिणी हूं।
अब वह रंग कर्मी नहीं,
कुल की मर्यादा धारिणी हूं।।
अखंड प्रेम बसे जीवन में,
मैं पति व्रत पारिणी हूं।
हम तुम जब एक वरण हैं,
मैं कुल शील चारिणी हूं।।
स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने “रजकण”
बालाघाट (मध्य प्रदेश)