बेबसी
मैं , कश्ती बना रहा था सभी के लिये
चाह रहा था करें सब पार मझधार
बडे यत्न से चुन चुन लकडी लगायी थी
तराश कर खुद पर कीलें भी सजायी थी ।
मैं बेहोश हो बस बढ रहा था
अपनी हर कोशिश और यत्न कर रहा था
थी मेरे चाहने वालों की भीड हर तरफ
हर इक मुझे अपना कह कह
कश्ती पे चढ रहा था ।
मगर एक हवा के झौंके से कश्ती क्या डोली
देखा सब लगा रहे थे मेरी बोली
मेरे अपने दिखने वाले सब से आगे थे
हाथ जिसके जो आये लूटने पे आमादा थे
अजब ही मंजर मेरी आँखो के आगे था
जीवन भंवर में सच न कोई साथी था ।
यकीं था मुझे ए मेरे रब मेरे महरबां तुझ पर
सोच रहा था पर न मिलेगा अब इनको कोई पथ प्रदर्शक
मैं तो तेरी डोर पकड़ कर पार हो ही जाऊंगा
पर ये सब कहाँ जायेंगे अपनी ही कश्ती डूबोने वाले
लूट रहे हैं मुझे ये सब भोले भाले
छल रहे खुद को ही , ये मुझे छलने वाले
पर्दा सबकी आाँखो पर अज्ञानता का पडा था
मैं उन सबके लिये
उस पार
लिये नम आँख और करुणा तेरी पनाह में खडा था ।
Kavita Madhur