दोहा सप्तक. . . . . . ताप
दोहा सप्तक. . . . . . ताप
सूरज अपने ताप का, देख जरा संताप ।
हरियाली को हर गया, जैसे तेरा श्राप ।।
सूरज तेरे ताप से, पर्ण हुए सब पीत ।
शाखों की छाया नहीं, पथिक लगें भयभीत ।।
तन- तन कर सूरज चले, मस्त गगन में आज ।
ऐसा लगता सृष्टि में, आज उसी का राज ।।
वसुंधरा का हो गया, शुष्क ताप से रूप ।
हरियाली को कर गई, चौपट तीखी धूप ।।
सूरज देखो कर रहा,कैसा तांडव आज ।
वसुधा की काया फटी, ठूंठ बने सरताज ।
हुए भयंकर ताप में, जीव सभी हैरान ।
वृक्षों की छाया मिटी, राह लगे सुनसान ।।
आग बरसती धूप में, विहग ढूँढते छाँव ।
शहर तपे कंक्रीट का, कहाँ टिकाएं पाँव ।।
सुशील सरना / 20-5-25