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20 May 2025 · 1 min read

दोहा सप्तक. . . . . . ताप

दोहा सप्तक. . . . . . ताप

सूरज अपने ताप का, देख जरा संताप ।
हरियाली को हर गया, जैसे तेरा श्राप ।।

सूरज तेरे ताप से, पर्ण हुए सब पीत ।
शाखों की छाया नहीं, पथिक लगें भयभीत ।।

तन- तन कर सूरज चले, मस्त गगन में आज ।
ऐसा लगता सृष्टि में, आज उसी का राज ।।

वसुंधरा का हो गया, शुष्क ताप से रूप ।
हरियाली को कर गई, चौपट तीखी धूप ।।

सूरज देखो कर रहा,कैसा तांडव आज ।
वसुधा की काया फटी, ठूंठ बने सरताज ।

हुए भयंकर ताप में, जीव सभी हैरान ।
वृक्षों की छाया मिटी, राह लगे सुनसान ।।

आग बरसती धूप में, विहग ढूँढते छाँव ।
शहर तपे कंक्रीट का, कहाँ टिकाएं पाँव ।।

सुशील सरना / 20-5-25

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