धरा हमारी — फिर भी प्रश्न क्यों?"
अंग से अफ़ग़ान तलक,
जन्नत आओर पाकिस्तान तलक —
धरती मेरी!
धरती तुम्हारी!
कहाँ नहीं फैला था इसका आँचल?
सभ्यताओं की माँ थी यह,
हड़प्पा की नींव में जिसकी साँसें थीं,
वेदों की ऋचाएँ गूँजी थीं
सिन्धु के प्रवाह में।
यहाँ शब्द जन्मे थे,
यहाँ सत्य ने प्रथम बार
मनुष्य की देह धारण की,
यहाँ राम ने वन स्वीकारा,
यहाँ कृष्ण ने धर्म का गीता में गान किया।
तो फिर युद्ध क्यों?
यह भूमि,
जहाँ पत्थरों से पूजे गए विचार,
जहाँ ख़ून से लिखा गया
पुस्तकों का धर्म,
जहाँ धर्म के नाम पर
मानव की नस काट दी गई,
वहाँ अब प्रश्न हूँ मैं।
क्या मिट्टी की सीमाएँ
इतनी छोटी हैं,
कि उसमें मनुष्य का हृदय नहीं समाता?
क्या झंडे की लाठी पर
झूलता है केवल गर्व,
या जलती है उसके नीचे
किसी माँ की छाती?
मैं पूछता हूँ—
हे कुरान, हे बाइबिल,
हे रामायण, हे गीता —
तुम्हारी वाणी
केवल मंदिरों और मस्जिदों तक सीमित क्यों?
तुमने तो कहा था,
“मनुष्य ही ईश्वर का रूप है!”
तो फिर मनुष्य का रक्त
इतना सस्ता क्यों?
मैं देखता हूँ—
बमों की भाषा,
भूख की व्याकुलता,
नारी की चुप्पी,
शिशु की भूख,
और राष्ट्रों की युद्ध-घोषणा
— सब एक साथ गूँजते हैं!
किन्तु कविता?
कविता अब चुप है…
विधापति होते तो चीख पड़ते—
“हे भारत!
तू अब भी मौन क्यों?”
“हे मानव!
तू अब भी दानवों का साथी क्यों?”
मैं लिख रहा हूँ —
क्योंकि कविता अब धर्म है,
क्योंकि शब्द अब अस्त्र हैं,
क्योंकि युद्ध के मध्य
शांति की पुकार एक
अंधेरे में दिया है।
—श्रीहर्ष