युवा चेतना
उठो जवानों! देश पुकारे,
नव अरुणोदय द्वार निहारे।
सपनों को अब सत्य बनाओ,
नव इतिहास स्वयं रच जाओ।
सोच नहीं बस क्रिया जरूरी,
भीतर जागे ज्वाला पूरी।
हाथों में हो शक्ति का गहना,
मन में सच्चा दीपक बहना।
धर्म, देश, विज्ञान का संग,
युवशक्ति बन जाए अंग।
जोश नहीं बस हो समझदारी,
यही बनाये सच्ची तैयारी।
संस्कृति की धारा को जानो,
नव निर्माण का संकल्प ठानो।
युवक वही जो थके नहीं,
झुके नहीं, रुके नहीं।
चलो बनाएं नव भारत प्यारा,
हर दिल में हो देश हमारा।
युवा चेतना जगे निरंतर,
भारत बने विश्व विजेता अंतर।
लेखक: डॉ. गुंडल विजय कुमार