दोहा दशम . . . . . पिता
दोहा दशम . . . . . पिता
फटी बनियान बाप के, श्रम की है पहचान ।
भूली उसके त्याग को, नव युग की सन्तान।।
धन अर्जन के वास्ते, क्या -क्या सहता बाप ।
सुखी न हो परिवार तो, जीवन लगता श्राप ।।
चले पुत्र तो आज भी, पकड़ पिता का हाथ ।
चढ़ी जवानी हो गया, पुत्र बाप का नाथ ।।
लाख चढ़ाऐ चित्र पर, सुत फूलों के हार ।
जा कर फिर ना लौटता, घर का पालनहार ।।
लाखों अम्बर कम पड़े, उस अम्बर के बाद ।
रहते थे महफूज सब, घर भी था आबाद ।।
पिता पुत्र से चाहता, जरा काल में प्यार ।
पुत्र पिता की आस को, पल में दे दुत्कार ।।
पिता पुत्र का पोंछता, दुख में दृग का नीर ।
पुत्र पिता की अंत तक, समझ न पाया पीर ।
पिता पुत्र के बीच क्यों ,रहता सदा तनाव ।
देख पुत्र की हरकतें , अविरल होता स्राव ।।
धन वैभव ऐश्वर्य की, लोभी यह सन्तान ।
जब चाहे यह तोड़ दे ,रिश्तों की पहचान ।।
होता है अवसान के, बाद सदा अहसास ।
देते थे आशीष जो, नहीं हाथ वो पास ।।
सुशील सरना /19-5-25