रुख़ हवा का , इधर नहीं होता
गज़ल,,,,
1,,
रुख हवा का ,इधर नहीं होता,
क्यूँ तुम्हारा , सफ़र नहीं होता ।
2,,,
मान लेते , अगर मेरी बातें ,
घर में तेरे , क़हर नहीं होता ।
3,,,
बे – वजह लौट कर , चले आये ,
दुख तेरा क्यूँ , सिफ़र नहीं होता ।
4,,,
रात भारी लगे , हमेशा ही ,
रूबरू जब , क़मर नहीं होता ।
5,,,
‘नील’ अनजान, क्यूँ हो दरिया से,
देख कर भी , असर नहीं होता ।
✍नील रूहानी,,, 19/05/23,,,
( नीलोफ़र खान )