ग्रीष्मऋतु
ग्रीष्मऋतु
कुण्डलिया
(1)
कैसे गर्मी में लिखें,हम इष ऋतु की बात
मन स्थिर रहता नहीं,क्या दिन हो क्या रात
क्या दिन हो क्या रात,पसीना बहता हरदम
मच्छर,खटमल आदि,नाक में किये हुए दम
सही कहें तो प्राण,बँचा है जैसे-तैसे
इस हालत में आज, लिखें कुछ सम्भव कैसे
(2)
कैसे जन बैसाख में,गर्मी से बेचैन
सभी पसीना से भरे,कहीं न पाते चैन
कहीं न पाते चैन,न आती मुख से बानी
गला जा रही सूख,माँगती दिन भर पानी
जल तो डर कर कूप छोड़ भागा हो जैसे
हाय भला अब लोग, प्राण रख पाएँ कैसे
(3)
इतनी तपती धूल है,जले पाँव की खाल
जेठ मास में हो गया ,पथ पर चलना काल
पथ पर चलना काल,आग ऊपर से बरसे
व्याकुल होकर लोग सोचते चलें किधर से
इस असमय में प्यास भी बनी बैरी कितनी
हर लेगी वह प्राण,दे रही पीरा इतनी
(4)
जैसे ही बैसाख में,गई यहाँ से रैन
भोर हुआ सूरज निकल,छीना सबका चैन
छीना सबका चैन,सभी अकुलाए मन में
पंखा करते दीख रहे सब अपने में
पंखे से भी गर्म हवा ही निकले कैसे
यूँ लगता है आग की लपट आती जैसे
अवध किशोर ‘अवधू’
मोबाइल नम्बर 9918854285
दिनांक 18-05-2025