ये _जिंदगी तू _ही बता क्यों कर रही तू छल
ये _जिंदगी तू _ही बता क्यों कर रही तू छल
शायद कभी फिर हो ना हो मेरा सुहाना कल
था रास्ता कच्ची डगर, काटें बहुत चलते मगर,
हमको चुभन थी पांव में,हम जा रहे थे गांव मैं
किस_ रास्ते पे चल _दिए वो याद ना था पल
शायद कभी फिर हो ना हो मेरा सुहाना कल
जब पहुंचा मेरे गांव में,छाले पड़े थे पांव में
न प्रीत न वो मीत थे, न बचपने के गीत थे
थी मौत मेरे_ सामने_निकला _नही था हल
शायद कभी फिर हो ना हो मेरा सुहाना कल
✍️कृष्णकांत गुर्जर