मदन गोपाल
छाछ भरी मटकी को, तोड़ते हैं नंदलाल|
चोरी -चोरी छाछ अब, खाते ग्वाल- बाल हैं |
चोर को पकड़ कर,गोपी जब संग लायी|
देख रही मैया ये तो, मदनगोपाल हैं।
हाय!कृष्ण तुमने तो,नाक नीची कर दी है|
चोर को मैं कैसे कहूँ, मेरे नंदलाल हैं।
नहीं मैया!गोप गोपी, जलते हैं मुझसे ये,
इसीलिए नित्य ये,बिछाते नया जाल हैं।।
डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव प्रेम