विद्यापति का गाँव
यह गाँव नहीं,
यह मिट्टी का वह कण है,
जिसमें बसा है युगों का गौरव,
जहाँ हर धूलकण में छिपी है,
एक महाकाव्य की अमर गाथा।
यह बिस्फी है,
वह पावन धरा,
जहाँ विद्यापति ने रचे थे गीत,
जो आज भी काल के प्रवाह में अमर हैं।
यह भूमि केवल धरती नहीं,
यह तो वह तपोभूमि है,
जहाँ शब्दों ने मोक्ष पाया,
जहाँ वाणी बनी अमर,
और भावनाओं ने पाया था
जीवन का अंतिम सत्य।
विद्यापति ने गढ़ी थी यहाँ,
मिथिला की अनमोल गाथा,
प्रेम, भक्ति और शिव की महिमा।
यह गाँव नहीं, यह एक दीप है,
जिसकी लौ सदियों से जल रही है,
यह वह मशाल है,
जो साहित्य के आकाश में
सदियों तक उजाला करेगी।
यहाँ की हवाओं में गूंजती है,
वह राग,
जो शिव की महिमा गाता है,
और राधा प्रेम की मधुर धारा बहाता है।
बिस्फी वह रणभूमि है,
जहाँ शब्दों का संग्राम हुआ,
और हर शब्द एक अस्त्र बन गया।
यहाँ विद्यापति ने वाणी को शस्त्र किया,
और भाषा को दिया अमरत्व।
उनके गीतों में बसा है,
जीवन का सारा यथार्थ,
प्रेम की पीड़ा और भक्ति की शक्ति।
यह मिट्टी, वह माटी है,
जिसमें बहती है संस्कारों की गंगा,
यहाँ के खेतों में केवल अन्न नहीं उपजता,
यहाँ संस्कृति की धारा बहती है।
यहाँ का हर कण,
विद्यापति के शब्दों से अंकित है,
यह वह भूमि है,
जहाँ साहित्य ने पाया था अपना शिखर।
आज भी बिस्फी के आकाश में,
वह गीत गूंजता है,
जो कभी विद्यापति ने गाया था,
आज भी उसकी हवाओं में,
उसकी वाणी की महक है।
यह गाँव नहीं,
यह एक इतिहास है,
एक युग है,
जिसने मिथिला की शान को अमर किया।
बिस्फी केवल एक नाम नहीं,
यह तो वह धरोहर है,
जो युगों तक जगमगाएगी,
यह वह मशाल है,
जो संस्कृति के मार्ग को
सदैव प्रकाश करती रहेगी।
विद्यापति का गाँव,
मिथिला की वह शान है,
जो समय के साथ-साथ
और उजला लाऐगी।
—श्रीहर्ष —