तोहर माटि
तोहर माटि सँ उठल हुकार
लेले तोहर भरि अग्नि ज्वार
जाग रे बउआ, बजए मृदंग
क्षणो न रुकेउ,नहि भागु संग
त्यागु निद्रा के मोह मलिन
जोतु स्वदेश दीपक जलाए
शंखे ध्वनि कर, जागत बेस,
भस्म होयि जे अन्याय क्लेश।
हिय उठाय तो प्राण बानि,
सेइ भोर – तोर कल्याणी।
धरा बोल, पवन जय धाय
सअ रटत – “उठ! चिर नै काय।”
—श्रीहर्ष—-