एक स्त्री
एक स्त्री कितना सहती
इसका है क्या भान तुम्हें
सारा घर है वह सहेजती
क्या इसका है मान तुम्हें
सुबह सवेरे सबसे पहले
उठाना उसकी मजबूरी
नहीं उठेगी तो कैसे चलेगा
वहीं पूरे घर की है धुरी
पूरे दिन करती है परिश्रम
नहीं कभी है वह थकती
यदि कभी थक जाए भी
कह किसी से नहीं सकती
सब की सेवा वह करती है
फिर भी नहीं मेवा मिलती
थोड़ा उसका सम्मान करो
यही सभी से है विनती
मौलिक रचना
पूनम दीक्षित
कृष्णा विहार कॉलोनी
ज्वाला नगर रामपुर
उत्तर प्रदेश