शीर्षक - पाप पुण्य .... मन
शीर्षक – पाप पुण्य… मन
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पाप पुण्य तो हम सबसे होते हैं।
बस नजर मन भाव में रहते हैं।
आधुनिक समय में सच कहां है।
पाप पुण्य की सोच न समझ हैं।
सच ज़िंदगी नीरज लिखते हैं।
जीवन में पाप पुण्य रहते हैं।
न हम न तुम हम सब समझते हैं।
बस कुछ खुले कुछ बंद रहते हैं।
समय पर कुदरत पाप पुण्य बतातीं है।
हम सभी को वो समय पर याद आते हैं।
मन भावों में हम सच पाप पुण्य जानते हैं।
हां फिर भी हम ईश्वर को धोखा देते हैं।
हम साथ न लाएं न साथ ले जाना है।
पाप पुण्य की गठरी फिर जन्म पाना है।
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नीरज कुमार अग्रवाल चंदौसी उ.प्र.