लघुकथा:"मिट्टी की आत्मकथा"
“मिट्टी की आत्मकथा”
सदियों पुरानी बात है। एक छोटी-सी बस्ती के किनारे, एक पेड़ के नीचे मैं, मिट्टी, न जाने कितने जन्मों से चुपचाप पड़ी थी। मैं बोल नहीं सकती थी, पर सुनती थी , हर कदम की आहट, हर दुख की सिसकी, हर बच्चे की किलकारी।
मैंने समय को अपनी परतों में समेटा है।
कभी किसी किसान के हल की पहली लकीर बनी, कभी किसी स्त्री के आँचल की गंध समेटी।
मैंने देखा है प्रेम, युद्ध, तपस्या, और त्याग — सब कुछ।
एक दिन एक नन्ही बच्ची आई। उसके हाथ में एक छोटा सा बीज था। वह बैठ गई, मेरी छाती पर।
उसने कहा, “मिट्टी माँ, इसे पालना।”
मैं चुप रही। लेकिन मेरे भीतर कुछ हलचल हुई।
मैंने बीज को सीने से लगाया, रात भर उसे अपने उष्ण हृदय से गर्मी दी, सूरज से उजाला माँगा, बारिश से जल।
धीरे-धीरे वह बीज अंकुर बना, फिर पौधा, फिर वृक्ष।
बच्ची रोज़ आती, मुझे छूती, गुनगुनाती।
वर्षों बीत गए।
बच्ची बड़ी हो गई, और शहर चली गई।
उसका लगाया वृक्ष अब विशाल हो चुका था —
और मैं अब भी वहीं थी, उसकी याद में भीगी।
फिर एक दिन, कुछ लोग आए —
ईंटें बनाने, मकान खड़े करने।
उन्होंने मुझे खोदना शुरू किया।
मेरे भीतर जन्मे बीज चिल्लाए,
मेरे कण-कण ने गुहार लगाई:
“मैं सिर्फ मिट्टी नहीं हूँ —
मैंने जीवन दिया है, इतिहास जिया है।”
मुझे गूंधा गया, जलाया गया,
मैं ईंट बनी —
और उसी बच्ची के घर की दीवारों में जुड़ गई,
जो अब एक स्त्री बन चुकी थी।
एक दिन वह मेरी दीवार से टेक लगाकर बोली —
“यह घर बहुत अपना-सा लगता है।”
मेरी रूह मुस्कराई।
मैं कुछ कह नहीं सकती थी, पर मेरी गरमी ने उसकी पीठ से कहा ,
“मैं अब भी तेरे साथ हूँ ,
मैं मिट्टी हूँ …
और मेरा प्रेम, मेरी स्मृति, तुझमें हमेशा रहेगी।”
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”