मेरे संघर्ष
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मेरे संघर्ष
हर सुबह से पहले उठता हूँ मैं,
न अपनी थकान देखता, न चाहतें गिनता हूँ।
क्योंकि मेरी ज़िन्दगी का नाम है — परिवार,
और मेरी हर सांस उन्हीं के लिए जिंदा है।
कभी पिता बनकर छांव दिया,
तो कभी माँ बनकर दुआ सी बिछा दी।
अपनी भूख छिपाकर बच्चों को खिलाया,
खुद फटे में रहकर भी उन्हें नया पहनाया।
मेरे सपनों ने समझौते करना सीख लिया,
जब घर के सपनों ने उड़ान भरनी शुरू की।
मेरी हँसी अधूरी रही कई बार,
पर उनके चेहरों की मुस्कान ही मेरा इनाम थी हर बार।
कभी थक भी जाता हूँ अंदर से,
पर कह नहीं पाता किसी से।
क्योंकि मेरी मजबूती ही उनका भरोसा है,
और मेरी ख़ामोशी ही उनका सुकून।
मैं नहीं जानता मैंने कितना खोया,
पर जो पाया वो अनमोल था।
एक भरा-पूरा घर, उनके चेहरे पर चैन —
यही तो मेरी सबसे बड़ी दौलत है।
मुकेश शर्मा विदिशा