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17 May 2025 · 1 min read

कुंडलिया छ्न्द

कुंडलिया छ्न्द

सस्ता धंधा धर्म का, लगता कुछ को देख।
भूल चले भगवान को, बदल धरम की लेख।
बदल धरम की लेख, लिखे निज स्वारथ जैसा।
मूरख जनता देख, मानती सब कुछ वैसा।
मानवता है पस्त, सत्य की हालत खस्ता।
रोते खुद भगवान, देख यह धंधा सस्ता।।

डाॅ. सरला सिंह “स्निग्धा”
दिल्ली

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