सस्ता धंधा धर्म का - दोहा मुक्तक
सस्ता धंधा धर्म का, चलता चारों ओर।
पाप-पुण्य के नाम पर, यहाँ छलावा घोर।।
जनता भोली फँस रही, ऐसा बुनते जाल।
संत बने बैठे हुए, ठगते जैसे चोर।।
सस्ता धंधा धर्म का, चलता चारों ओर।
पाप-पुण्य के नाम पर, यहाँ छलावा घोर।।
जनता भोली फँस रही, ऐसा बुनते जाल।
संत बने बैठे हुए, ठगते जैसे चोर।।