*"सपनों के अवशेष"*
“सपनों के अवशेष”
सांझ की छाया में बिखरे
वे स्वप्न,
जो कभी आँखों की दहलीज़ पर
मोती-से जड़े थे—
आज शून्य के गर्त में
धूल की मानिंद उड़ते हैं।
वे स्वप्न,
जो चुपचाप रात्रि के आँगन में
सितारों की छांव तले पनपे थे,
नन्हीं कल्पनाओं के आँचल में
कभी धीमे स्वर में गाते थे,
आज मौन हैं—
मौन जैसे टूटी वीणा की
एक बिन बोले पुकार।
तिनके-तिनके बटोरती हूँ
उन स्वप्नों के अवशेष—
टूटी हुई उम्मीदों के छल्ले,
कुछ अधजले अक्षर,
कुछ अधूरी प्रार्थनाएँ,
और मन की स्याही से रँगे
वे शब्द—जो कभी कविता बन सकते थे।
क्या यही नियति है स्वप्नों की?
कि वे जल उठें यथार्थ की धधकती धूप में,
और शेष रह जाए
केवल उनकी छाया—
धुंधली, थकी हुई,
किन्तु अमर?
फिर भी इन अवशेषों में
स्पंदित है एक अन्तःगूढ़ जीवन,
एक मौन नाद—
जो कहता है,
“स्वप्न मरते नहीं…
वे बस रूपांतरित होते हैं
एक नए सृजन में।”
इसलिए मैं उठाती हूँ
हर टूटा टुकड़ा,
हर बिखरा विश्वास—
और रचती हूँ
एक नई कविता,
एक नई शुरुआत,
सपनों के उन्हीं पवित्र अवशेषों से।
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद “