बेसुरी आवाजें .......
बेसुरी आवाजें …….
मन ढूँढता रहा
नीरवता में
खोये हुए कोलाहल को
साथ ले गई
अपनी बेसुरी आवाज़ें
खाँसी की
जीवन के अंतिम पहर में
अपने साथ
जाने कितने सपने,
कितने दर्द छुपे थे
बूढ़ी माँ की
उस बेसुरी खरखरी
खाँसी में
पहले वो खाँसती थी
तो नींद नहीं आती थी
अब
न माँ है
न उसकी बेसुरी खाँसी
फिर भी
नींद नहीं आती
बस
एक अजीब सी रिक्तता में
ढूँढता हूँ
फिर वही बेसुरी खाँसी की
खरखरी आवाज़
और
उस आवाज़ के पल्लू से बंधी
अपनी
माँ
नीरवता में
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित